मोहम्मद आलम प्रधान संपादक
(alamkikhabar.com)
समस्तीपुर। समस्तीपुर जिले में अफसरशाही का घमंड इस कदर सिर चढ़कर बोल रहा है कि अब आम जनता का फोन उठाना भी अधिकारियों को बोझ और शर्म की तरह महसूस होने लगा है। जिले के कई विभागों से लगातार ऐसी शिकायतें सामने आ रही हैं कि जनता घंटों-घंटों कॉल करती रहती है, लेकिन पदाधिकारी फोन उठाना तक जरूरी नहीं समझते। सबसे गंभीर तथ्य यह है कि इस लापरवाही की फेहरिस्त में जिले के वरीय पदाधिकारी तक शामिल बताए जा रहे हैं। जब जिले के शीर्ष अधिकारी ही जनता के फोन को अनदेखा कर दें, तो अन्य पदाधिकारियों से संवेदनशीलता की उम्मीद करना एक खोखला सपना बनकर रह जाता है।
यह स्थिति सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की असफलता को उजागर करती है। जनता सवाल कर रही है कि आखिर किसके दरवाजे जाएं, किससे अपना दुख-दर्द कहें और अपनी समस्या का समाधान कैसे कराएं? यदि अधिकारी फोन ही नहीं उठाएंगे तो आमजन अपनी तकलीफें किसे सुनाएं और उनका निदान कैसे होगा? प्रशासन और जनता के बीच संवाद ही खत्म हो जाए, तो व्यवस्था का चलना लगभग असंभव हो जाता है।
सरकार कितनी भी योजनाओं के प्रचार में लगी रहे, लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि जनता की आवाज़ अधिकारियों तक पहुंच ही नहीं रही है। सरकार की चुप्पी और अफसरों की बेपरवाही ने मिलकर स्थिति को भयावह बना दिया है। लोग अपने हक की बात कहने के लिए फोन करते हैं, पर प्रशासन की तरफ से सिर्फ मौन मिलता है। यह न केवल जनता का अपमान है बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सीधा प्रहार भी है।
समस्तीपुर के लोग अब खुले शब्दों में कह रहे हैं कि अधिकारी जनता से दूर होते जा रहे हैं। कई लोगों ने बताया कि उन्होंने जरूरी मुद्दों पर दर्जनों बार कॉल किया, लेकिन किसी अधिकारी ने उनकी बात सुनना तो दूर, कॉल बैक तक नहीं किया। इससे साफ है कि जनता को प्रशासन के भरोसे छोड़ देना अब जोखिम भरा हो गया है। यह एक गंभीर सवाल है कि क्या समस्तीपुर में अफसरशाही जनता से ऊपर हो चुकी है?
जनता अब उच्चस्तरीय हस्तक्षेप की मांग कर रही है। लोगों का कहना है कि फोन न उठाने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई हो, स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाएं और प्रशासन को यह समझना होगा कि उनकी कुर्सी जनता के भरोसे पर टिकी है। यदि जनता ही उपेक्षित हो जाएगी, तो शासन का आधार ही खत्म हो जाएगा।समस्तीपुर में बढ़ती शिकायतें यह साफ बता रही हैं कि अब जनता थक चुकी है और नाराज़ भी है। लोग कह रहे हैं कि यदि अधिकारी जनता की आवाज़ से ही भागेंगे, तो फिर जनता प्रशासन पर भरोसा क्यों करे? यह सिर्फ एक शिकायत नहीं, बल्कि एक चेतावनी है कि अब जनता चुप नहीं बैठेगी। अधिकारी हों या सरकार—सबको जनता की आवाज़ सुननी ही होगी, क्योंकि जनता ही मालिक है।यह अफसरशाही की हठधर्मिता सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि जनता के प्रति अपमान है।एक तरफ जनता समस्याओं से जूझ रही है, दूसरी तरफ अधिकारी इस तरह व्यवहार कर रहे हैं मानो उनका कोई हिसाब-किताब नहीं।“अगर फोन उठाने भर से डर लगता है,
तो फिर जनता की सेवा करने की कसम क्यों खाई थी?”यह सवाल अब पूरे जिले में गूंज रहा है।यह एक गंभीर प्रशासनिक विफलता है, जिसके लिए उच्च स्तरीय हस्तक्षेप की सख्त जरूरत है।जनता चाहती है कि:इस मामले पर सरकार तुरंत संज्ञान ले,ऐसे अधिकारियों की जवाबदेही तय हो जनता से कटे हुए अधिकारियों पर कार्रवाई हो हर पदाधिकारी को फोन रिसीविंग को लेकर स्पष्ट निर्देश दिए जाएं,क्योंकि अगर अधिकारी फोन नहीं उठाएंगे,तो जनता किसके दरवाज़े जाएगी?जनता कह रही है,अगर हमारा प्रशासन हमारी आवाज़ नहीं सुनेगा,तो फिर यह प्रशासन किसके लिए है?”समस्तीपुर के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों से लगातार शिकायतें हैं कि फोन उठाना तो दूर,कॉल बैक करना भी जरूरी नहीं समझते अधिकारी।कई दफ्तरों में ऐसा व्यवहार मानो जनता नहीं, उन पर बोझ हो।जब तक अधिकारी फोन नहीं उठाएंगे, तब तक ‘जनता दरबार’ सिर्फ नाटक है,सरकार योजनाओं, सुविधाओं और विकास के बड़े-बड़े दावे करती है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि,जनता की आवाज़ सरकार तक पहुंच ही नहीं रही,अधिकारी जनता से कट चुके हैं,प्रशासनिक तंत्र ध्वस्त जैसा दिख रहा है,अगर सरकार वाकई जनता के प्रति जवाबदेह है, तो उसे समझना होगा,फोन न उठाने वाला अधिकारी जनता के अधिकारों को कुचल रहा है।समस्तीपुर जिले में प्रशासनिक संवेदनशीलता की हालत इतनी बदतर हो गई है कि अब इसे ‘फोन न उठाने वाले अफसरों का जिला’ कहा जाने लगा है।
आम जनता परेशान, समस्याओं से कराहती हुई, मदद की आस में पदाधिकारियों को कॉल करती है—पर जवाब में सिर्फ रिंगटोन बजती है और चुप्पी लौटती, जब तक अधिकारी फोन नहीं उठाएंगे, तब तक ‘जनता दरबार’ सिर्फ दिखावा है और ‘सुनवाई’ एक नाटक। समस्तीपुर की जनता अब एक ही बात कह रही है,अफसरशाही का घमंड बहुत हो चुका, अब जवाबदेही चाहिए।