मोहम्मद आलम प्रधान सपादक
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बदलाव की बात बड़े-बड़े मंचों से की गई। कहा गया कि चुनाव के बाद विधायक दल ही मुख्यमंत्री तय करेगा। लेकिन 19 नवंबर के नज़ारे ने इस दावे की धज्जियाँ उड़ाते हुए साफ बता दिया कि बिहार की राजनीति में विधायक दल अब सिर्फ कुर्सी पर बैठे हुए लोग नहीं, बल्कि दर्शक दीर्घा में बैठे हाथ जोड़ने वाले पात्र बन चुके हैं। फैसले पहले होते हैं, विधायक बाद में सिर हिलाते हैं।
14 नवंबर को ही यह साफ हो गया था कि बीजेपी अपने किसी नेता को मुख्यमंत्री नहीं बनाएगी। लेकिन फिर भी चुनाव प्रचार में किए गए “बड़े-बड़े वादे” ऐसे बिखरे कि जैसे किसी को याद ही न हो कि जनादेश किसलिए मिला था।
गांधी मैदान का शपथ समारोह — शोलों की जगह राख का माहौल
पटना के गांधी मैदान में शपथ ग्रहण का समारोह आयोजित हुआ, लेकिन यह आयोजन उतना ही बेअसर दिखा जितना किसी फीके नाटक का आखिरी दृश्य।भीड़ आई, लेकिन चेहरों पर चमक नहीं।मंच था, लेकिन माहौल नहीं।शोर था, लेकिन उम्मीदें गायब।
नए बिहार की बात करने वाली सरकार में नयापन खोजने के लिए शायद माइक्रोस्कोप चाहिए।
क्योंकि मंच पर बैठे चेहरे उन सवालों से ज़्यादा पुराने लगे, जितना व्यवस्था का ढर्रा।
जनादेश को कैसे समझें?
वही चेहरे, वही मंत्रिमंडल, वही आरोप—तो फिर क्या बदला?
कई ऐसे मंत्री, जिन पर भ्रष्टाचार के आरोप सार्वजनिक रूप से दर्ज हैं, फिर से शपथ लेते दिखे—और यह दृश्य देखकर हर उस युवा का दिल टूटा होगा जो बदलाव के लिए वोट देने गया था।अगर ‘दागदार’ चेहरे ही दोबारा सत्ता में लौटने वाले हैं,
तो फिर भ्रष्टाचार मुक्त बिहार का नारा क्या सिर्फ भाषणों की लिपस्टिक था?
सबसे बड़ा सवाल: रोजगार कहाँ है? कौन देगा? कैसे देगा?
बिहार का सबसे बड़ा दर्द है बेरोजगारी,लेकिन शपथ समारोह में इसपर एक शब्द भी सुनाई नहीं दिया।जैसे सरकार पहले ही तय कर चुकी हो कि,युवाओं के भविष्य की चर्चा खतरे का विषय है।बिहार के लाखों युवा आज भी देशभर के शहरों में मजदूरी कर रहे हैं।
इंजीनियर हो या डिग्रीधारी, सब अपनी मिट्टी से दूर पेट पाल रहे हैं।
लेकिन नई सरकार को इससे ज़रा भी बेचैनी नहीं दिखी।
बंद पड़े चीनी मिल, पेपर मिल, जूट मिल—कब चलेंगे?
किसी मंत्री ने यह नहीं कहा कि वे इन फैक्ट्रियों को चालू करेंगे।किसी ने यह नहीं बताया कि बिहार में उद्योग लाने के लिए क्या किया जाएगा।
सच तो यह है कि सरकार को यह स्वीकार करने में भी डर लगता है कि
उद्योग के बिना बिहार का भविष्य अंधेरे में है।
क्या बिहार में फैक्ट्री लग सकती है? या फिर हम सिर्फ भाषणों की फैक्ट्री चलाते रहेंगे?
हर चुनाव में फैक्ट्रियों का वादा किया जाता है,लेकिन हकीकत यह है कि
बिहार में उद्योग लगाने से निवेशक कतराते हैं—और सरकारें यह सच्चाई छिपाकर सिर्फ घोषणाओं के ढोल बजाती रहती हैं।
बिहार में नौकरी कब मिलेगी?
शपथ ग्रहण में इस सवाल का कोई जवाब नहीं मिला।न कोई रोडमैप,न कोई घोषणा,न कोई विज़न।
लोग उम्मीद लिए बैठे थे कि शायद नए मंत्रिमंडल में नए लोग होंगे,
नया सोच होगी,नया बिहार बनेगा…
लेकिन भीड़ की आंखों के सामने जो दृश्य था,वह यह था कि,बिहार बदलने नहीं जा रहा,बिहार फिर से वही गलियों में लौट रहा है जहाँ पहले भी खो गया था।
राजनीति का नया गठजोड़, लेकिन सोच वही पुरानी
चेहरे बदल सकते हैं,गठबंधन टूट सकते हैं,नई शपथें ली जा सकती हैं
लेकिन बिहार की असली समस्या
नीतियों की जड़ता—उसी की तरह खड़ी है, सलाम करते हुए।
बिहार के लोग अब इतने समझदार हो चुके हैं कि शपथ समारोह की चमक-दमक से प्रभावित नहीं होते।
वे रोजगार चाहते हैं।वे ईमानदार प्रशासन चाहते हैं।वे उद्योग चाहते हैं।
वे भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था चाहते हैं।
लेकिन शपथ समारोह का पूरा दृश्य यही कह रहा था—यह सरकार बिहार की उम्मीदों को नहीं,
सिर्फ बिहार की सत्ता को संभालने आई है।