पटना. बिहार की राजनीति इस कदर परिवारवाद की गिरफ्त में जा चुकी है कि आज लोकतंत्र की असली मालकिन जनता नहीं, बल्कि नेताओं के घरों की ‘वंश परंपरा’ बन गई है। कभी कहा जाता था—“राजा का बेटा राजा होता है।” पर बिहार ने इस कहावत को नया रूप दे दिया है“नेता का बेटा मंत्री, नेता की पत्नी विधायक, नेता का खानदान सत्ता का मालिक।”राजनीतिक परिवारों का यह साम्राज्य अब इतना विशाल हो गया है कि बिहार की सत्ता जनता के वोट से नहीं, बल्कि नेताओं की वंशानुगत लाइन से तय होती दिखती है।
उपेंद्र कुशवाहा: जनता हारी, परिवार जीता—बिहार परिवारवाद की पाठ्यपुस्तक का ताजा अध्याय
काराकाट लोकसभा से हारने वाले उपेंद्र कुशवाहा आज राज्यसभा में हैं। उनकी पत्नी विधायक हैं, और बेटा दीपक प्रकाश—जिसने चुनाव तक नहीं लड़ा—सीधे कैबिनेट में मंत्री!यह लोकतंत्र का मजाक है या जनता की नादानी?वोट जनता दे, और मेवा पूरा परिवार खा जाए—यह बिहार के ‘नए लोकतंत्र’ का असली चेहरा दिखता है।
बिहार विधानसभा: सदन नहीं, नेताओं के घरों की पारिवारिक लिस्ट
यह केवल एक परिवार की कहानी नहीं। बिहार विधानसभा की लगभग 24 सीटों पर परिवारवाद की ठप्पा लगी हुई है।इसका अर्थ यह है कि आधा सदन नेताओं के घरों की उत्तराधिकार-लिस्ट से भरा है—जहां टिकट, सत्ता और मंत्रालय जनता के भरोसे नहीं, बल्कि खून के रिश्तों से तय हो रहे हैं।
बिहार का परिवारवाद मॉडल—हर दल में फैला संक्रमण
HAM – 80% विधायक वंशवाद से आए
RJD – 40%
JDU – 22%
BJP – 23%
RLSP/रालोमो – 50%
यह आंकड़े चिल्लाकर बता रहे हैं कि बिहार की राजनीति विचारधारा पर नहीं, वंश-धारा पर चल रही है।
“परिवार सरकार” के मंत्री—कौन असली जनता के प्रतिनिधि और कौन वंशज?
संतोष सुमन मांझी – पिता पूर्व मुख्यमंत्री, पत्नी विधायक, सास विधायक। पूरा परिवार राजनीतिक कंपनी चलाता है।
सम्राट चौधरी – मंत्री पद विरासत में।
दीपक प्रकाश – सबसे बड़ा उदाहरण: चुनाव ना लड़ा, फिर भी मंत्री!
श्रेयसी सिंह – सीधे राष्ट्रीय परिवार की राजनीति से ट्रांसफर होकर बिहार कैबिनेट में।
रमा निषाद – पति और ससुर दोनों सांसद रहे।
नितिन नवीन, अशोक चौधरी, लेसी सिंह—सब राजनीति घराने से आते हैं
इन सबकी राजनीतिक यात्रा जनता की सेवा से शुरू नहीं हुई, बल्कि अपने-अपने घरों के ड्राइंग रूम में तय हो गई थी।
क्या लोकतंत्र अब परिवारों की प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बन गया है?
राजनीति अब पेशा नहीं रही—परिवारों का बिजनेस बन चुकी है।
जिस तरह उद्योगपतियों की कंपनियों में चेयरमैन का बेटा एमडी बनता है, उसी तरह नेताओं के घरों में विधायक-मंत्री बनने की बारी ऊपर से नीचे तक बंटकर तय है।
संघर्ष?
जनाधार?
जनसेवा?
ये शब्द अब बिहार में राजनीतिक भाषणों का सामान हैं—वास्तविक राजनीति में नहीं।
सबसे बड़ा धोखा—जनता वोट दे रही है, सत्ता परिवारों में घूम रही है
क्या जनता ने इन परिवारों को वोट दिया था?क्या जनता ने ‘उपेंद्र कुशवाहा का बेटा मंत्री बने’ का वचन दिया था?क्या किसी घोषणापत्र में लिखा था कि ‘नेताओं के घर की नई पीढ़ी सीधे सत्ता में शामिल होगी’?
लेकिन चुनाव खत्म होते ही सत्ता की कुर्सी उन्हीं घरों में पहुंच जाती है, जहां पीढ़ियों से झंडा-डंडा जमा है।
बिहार का भविष्य: लोकतंत्र मजबूत होगा या कुछ परिवार और मजबूत हो जाएंगे?
राजनीति अगर इसी रास्ते पर चलती रही, तो आने वाली पीढ़ियां जनप्रतिनिधि नहीं, राजनीतिक उत्तराधिकारियों की परेड देखेंगी।
बिहार की राजनीति का यह वंशवाद अब इतना गहरा हो चुका है कि लोकतंत्र कमजोर नहीं—बेहद बीमार दिखता है।इसलिए सवाल जनता से है:क्या लोकतंत्र सिर्फ मतदान तक सीमित रह गया है?क्या सत्ता अब जनता की है या नेताओं के खानदानों की निजी जागीर?क्योंकि बिहार में आज की राजनीति में यह साफ दिख रहा है—जनता सिर्फ वोट देती है, और सत्ता परिवार ले जाता है।