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उद्योग मंत्री के सामने पहाड़ जैसी चुनौती: बिहार के युवाओं का भविष्य अब दिलीप जायसवाल के फैसलों पर टिका

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बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान NDA ने जनता को रोजगार और उद्योग के ऐसे सपने दिखाए थे, जैसे अब बिहार में हर ज़िले में कारखाने खड़े होंगे और नौकरियों की बाढ़ आ जाएगी। जनता ने भारी बहुमत देकर सरकार भी बना दी, मंत्रिमंडल भी तैयार है—लेकिन असली कसौटी अब शुरू होती है।
सबसे भारी जिम्मेदारी आकर टिक गई है उद्योग मंत्री दिलीप जायसवाल के कंधों पर।बिहार में उद्योगों की वर्तमान स्थिति किसी से छिपी नहीं.यहाँ नई फैक्ट्रियों की बात तो बाद की है, पुराने उद्योग ही खंडहरों में तब्दील हैं।अब पूरा राज्य यही देख रहा है कि दिलीप जायसवाल इस चुनौती को कितनी गंभीरता से लेते हैं और उद्योग लगाने की दिशा में कितने निर्णायक कदम उठाते हैं।
अगर वे अपनी चुनौती पर खरे उतरते हैं तो बिहार का युवा रोज़गार के लिए दिल्ली-मुंबई नहीं भागेगा, बल्कि अपने ही राज्य में सम्मान के साथ काम पाएगा।

बिहार के लिए असली समाधान क्या है?

बिहार के लिए असली समाधान यही है कि.बंद उद्योग चालू कराए जाएँ, नए उद्योग लाए जाएँ।इसी से बेरोज़गारी का बोझ कम होगा।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि नए उद्योग लगाने की बात तो दूर,
बिहार के पुराने उद्योग ही कब्रिस्तान बने पड़े हैं।समस्तीपुर, मुजफ्फरपुर, बेगूसराय से लेकर बक्सर तक
हजारों करोड़ के कारखाने ताला झूलते मिलते हैं।अगर सरकार सिर्फ इतना कर दे कि यहीं पड़े बंद उद्योगों को पुनर्जीवित कर दे,तो हजारों युवाओं को तुरंत रोजगार मिल सकता है।इसके बाद केंद्र के सहयोग से नए उद्योग लगाए जाएँ
तो बिहार की अर्थव्यवस्था तेज़ रफ्तार से पटरी पर लौट सकती है।

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