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हर बहे सो खर खाए, बैठल बकरी अचार खाए

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मोहम्मद आलम प्रधान सपादक
 alamkikhabar.com
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सत्ता की तनख़्वाहें चांद पर पहुँचीं और जनता की कमाई अब भी ज़मीन की धूल फाँक रही—लोकतंत्र की यही विडंबना सबसे चुभती है
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बिहार की सामाजिक-आर्थिक सच्चाई में अगर कोई कहावत आज सबसे सटीक बैठती है, तो वह है।
“हर बहे सो खर खाए, बैठल बकरी अचार खाए।” यह कहावत सिर्फ एक व्यंग्य नहीं, बल्कि व्यवस्था के भीतर मौजूद उस गहरे असमान संतुलन का आईना है, जिसकी मार वर्षों से जनता झेल रही है। विरोधाभास यह है कि जिन्हें जनता की सेवा के लिए चुना जाता है, उनकी सैलरी, भत्ता, यात्रा सुविधा, सुरक्षा और प्रोटोकॉल हर वर्ष बढ़ते जा रहे हैं। वहीं, वही जनता—जो इन नेताओं को चुनती है, टैक्स देती है, विकास की उम्मीद करती है—आज भी अपनी कमाई, अपनी नौकरी की असुरक्षा और अपनी दैनिक जरूरतों के बोझ में दबी हुई है।

नेताओं की बढ़ती तनख़्वाह—बाढ़ की तरह बढ़ोतरी, किनारा नहीं दिखाई देता

हाल के वर्षों में विधायकों और मंत्रियों की तनख़्वाह और सुविधाओं में जिस तरह उछाल आया है, वह किसी निजी कंपनी की उत्पादकता आधारित पॉलिसी का परिणाम नहीं, बल्कि उन निर्णयों का नतीजा है जो वे खुद ही अपने लिए करते हैं। एक मंत्री बनने के साथ—65,000 का मूल वेतन, 70,000 क्षेत्रीय भत्ता, 3,500 रुपये प्रतिदिन का दैनिक खर्च, 29,000 रुपये का गेस्ट अलाउंस और यात्रा सुविधा के नाम पर अनगिनत सुविधाएँ। ये सब मिलाकर कुल पैकेज ढाई लाख रुपये से ऊपर पहुँच जाता है। इसके ऊपर, सुरक्षा कर्मी, सरकारी वाहन, फ्री फ्यूल, विशेष अतिथि सुविधा—सूची इतनी लंबी है कि आम नागरिक सिर्फ पढ़कर थक जाए, पर मंत्रीजी को इसे पाने में सिर्फ शपथ की एक लाइन लगती है।

वहीं जनता—दिन भर मेहनत, महीने भर चिंता, और साल भर तनाव

बिहार का मजदूर आज भी 300–350 रुपये दिहाड़ी में जीवन काट रहा है। शिक्षक वर्षों से समान काम समान वेतन की लड़ाई लड़ रहे हैं। युवा सरकारी नौकरी की उम्मीद में उम्र गुजार देते हैं। दफ्तरों में फाइलें वर्षों तक दबाकर रखी जाती हैं, प्रमोशन समय पर नहीं आते। महंगाई बढ़ती है, पर जनता की तनख़्वाह वही रहती है। बिजली-पानी के बिल, किराया, दवा, फीस—हर चीज़ बढ़ी है, पर जनता की जेब का वजन नहीं बढ़ा। उसके पसीने की कीमत वैसे ही अनमोल शब्दों में लिखी जाती है, पर जमीन पर उसका मूल्य सबसे सस्ता।

इसीलिए लोग कहते हैं—मेहनत करने वाला सिर्फ पसीना पीता है, और बैठे-बैठे लोग मलाई खाते हैं।

विधानसभा की कैबिनेट बैठक—जहाँ जनता का दर्द नहीं, नेताओं की सुविधाएँ तय होती हैं

अप्रैल 2025 की कैबिनेट बैठक में जब नेताओं के वेतन और भत्तों में 30% की बढ़ोतरी का फैसला आया, तो यह वही समय था जब जनता महंगाई की मार से कराह रही थी। पेट्रोल-डीजल महंगा, गैस सिलेंडर महंगा, खाने का सामान महंगा, दवाइयां महंगी, लेकिन जनता की आमदनी कहाँ बढ़ी? कोई यूनियन आंदोलन करती है, तो सरकार बहाना देती है—राज्य पर आर्थिक बोझ बढ़ जाएगा। लेकिन जब बात मंत्री और विधायक की सुविधाओं की आती है, तो आर्थिक बोझ का चश्मा अचानक हट जाता है।

यही लोकतंत्र की सबसे कड़वी विडंबना है—निर्णय वही करते हैं जिन्हें फायदा होना है। जनता केवल दर्शक बनकर देखती है।

नेता और जनता—दो अलग-अलग आर्थिक ग्रहों पर जीवन

नेतृत्व वर्ग हवाई यात्रा करता है, जनता बस स्टैंड पर भीड़ में धक्के खाती है। मंत्री का इलाज बड़े अस्पताल में—VIP रूम में होता है, जनता दवा की पर्ची घर लाकर सोचती है कि अगली दवाई कब खरीदे। नेता सरकारी गाड़ी में मुफ्त सफर करता है, जनता अपनी साइकिल के पंचर तक सोचकर भरवाती है। नेता की निजी सुरक्षा पर महीनों में लाखों खर्च होते हैं, जनता अपनी गली तक में असुरक्षित महसूस करती है। नेताओं के लिए कानून व्यवस्था मजबूत हो, पर जनता के लिए “समीक्षा की जा रही है” वाली लाइन जारी रहती है।

एक दुनिया वह है जहाँ सुविधा सिर चढ़कर बोलती है,
और दूसरी वह—जहाँ संघर्ष गले की हड्डी की तरह फँसा रहता है।

लोकतंत्र की गिनती—मतों में जनता भारी, सुविधाओं में नेता भारी

लोकतंत्र जनता के मतों पर टिका है, लेकिन सुविधा और अधिकार नेताओं के लिए सुरक्षित। जनता बहुमत से सरकार बनाती है, पर सुविधा से सरकार खुद को बनाती है। जनता वोट देती है, नेता वेतन लेते हैं। जनता टैक्स देती है, नेता उससे यात्रा कर लेते हैं। जनता कानून मानती है, नेता उसे संशोधित कर लेते हैं। जनता की नौकरी के लिए परीक्षा, इंटरव्यू, मेरिट और मुश्किलें—नेता की नौकरी सिर्फ पार्टी की इच्छा पर मिल जाती है।

यही है जनता और सत्ता के बीच का सबसे बड़ा फर्क—जनता की कमाई में मेहनत शामिल होती है,नेताओं की कमाई में सिर्फ कुर्सी शामिल होती है।

कहावत का गूढ़ व्यंग्य—आज के समय का सबसे सटीक सत्य

“हर बहे सो खर खाए, बैठल बकरी अचार खाए।”
इस कहावत को पहले लोग मजाक में बोलते थे,आज लोग इसे कड़वी सच्चाई मानकर बोल रहे हैं।
यह कहावत व्यवस्था पर सवाल उठाती है—क्या मेहनत का फल वाकई मिलता है, या केवल कुर्सी का परछाईं ही आचरण तय कर देती है?

आज इस कहावत का व्यंग्य बिहार की सड़कों, गलियों, चाय की दुकानों और बस स्टैंडों पर साफ सुनाई देता है। जनता कहती है—हम मेहनत करके भी वही खर खाते हैं, और जो बस बैठे हैं, वे हर रोज़ अचार खाते हैं।

अंत में—यह वितरण नहीं, यह असमानता है

लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि जनता के सेवक होते हैं, लेकिन वेतन व्यवस्था देखकर लगता है कि यह सेवा का नहीं, सुविधा का पद बन चुका है। जनता अपनी कमाई के हर रुपये पर दो बार सोचती है, और सत्ता अपने सुविधाओं के हर हजार पर दो बार हँसती है। अब सवाल यह नहीं कि नेता कितना कमाता है—सवाल यह है कि जनता कब तक संघर्ष की खाई में धकेली जाएगी जबकि नेता सुविधाओं की पहाड़ी पर चढ़ते रहेंगे?

सरकारें आती-जाती हैं, पर यह अंतर आज भी जस का तस है।जनता उम्मीद करती है कि व्यवस्था बदलेगी, पर व्यवस्था उम्मीद करती है कि जनता चुप रहेगी।और यही वजह है कि यह कहावत, आज भी सबसे ज्यादा गूंजती है“हर बहे सो खर खाए, बैठल बकरी अचार खाए।”

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