मोहम्मद आलम प्रधान संपादक
aalamkikhabar.com
पटना. नई सरकार के बनते ही बिहार में प्रशासनिक मशीनरी जिस तेजी से अतिक्रमण हटाने के नाम पर सड़कों और फुटपाथों पर बुलडोजर चला रही है, उसने गरीब तबके की चिंताओं को और गहरा कर दिया है। समस्तीपुर से शुरू हुआ यह अभियान अब लखीसराय, दानापुर, भागलपुर और कई जिलों में फैल चुका है। सरकार का दावा है कि सड़क और सार्वजनिक जगहों को कब्जे से मुक्त कराना जरूरी है, लेकिन सवाल यह है कि जिन परिवारों की रोज़ी–रोटी इन छोटे ढांचों, फुस की दुकानों और गुमटियों पर टिकी थी, उनके लिए सरकार ने क्या व्यवस्था की है?
बिना वैकल्पिक व्यवस्था के कार्रवाई, गरीबों में गहरी बेचैनी
अभियान के दौरान कई जिलों में फुटपाथ दुकानदारों, मजदूरों और गुमटी चलाने वालों ने साफ कहा कि उन्हें हटाने से पहले कम से कम कोई वैकल्पिक जगह तय कर दी जाती।
छोटी दुकानों से गुजर-बसर करने वालों का कहना है कि महंगाई पहले ही उनकी कमर तोड़ चुकी है, ऊपर से अचानक सब कुछ उजाड़ देने से उनके सामने बच्चों का पेट पालने का संकट खड़ा हो गया है।
लखीसराय से समस्तीपुर तक कई जगह लोगों ने प्रशासन से समय या राहत की गुहार लगाई, लेकिन बुलडोजर नहीं रुका।
लोग पूछ रहे हैं,
“अगर सरकार हमें यहां रहने और दुकान चलाने से मना कर रही है, तो हम जाएँ तो जाएँ कहाँ?
कमाएँगे कैसे? खाएँगे क्या? बच्चों को कैसे पढ़ाएँ?”
समस्तीपुर से शुरू हुआ अभियान, लेकिन सबसे अधिक प्रभाव गरीबों पर
समस्तीपुर में रेलवे स्टेशन के पास पहले दिन से ही बुलडोजर चला। दर्जनों गुमटियां, ठेले और छोटे-छोटे ढांचे गिरा दिए गए। प्रशासन ने 10 दिन का समय जरूर दिया, लेकिन गरीबों का सवाल है—
“10 दिन में हम नया ठिकाना कहाँ ढूंढें? और क्या वह जगह भी हमसे कोई नहीं छीन लेगा?”
लखीसराय में पक्के निर्माण से लेकर झोपड़ियों तक सब कुछ ढहा दिया गया। तीन घंटे के अभियान में कई परिवार बेघर हो गए। कई लोगों ने कहा कि उनके पास ना रहने की जगह है, ना दुकान लगाने का कोई विकल्प।
दानापुर, सीतामढ़ी और भागलपुर में भी यही हाल—झोपड़ियां गिरीं, गुमटियां टूटीं, और हजारों का सामान जब्त हो गया। लेकिन यह नहीं बताया गया कि इन्हीं अवैध संरचनाओं से पेट पालने वाले लोग अब कहां जाएँ।
सरकार का लक्ष्य ठीक, लेकिन तरीका कठोर?
यह सही है कि सड़कें और सार्वजनिक जगहें खाली होनी चाहिए। नियम सबके लिए समान हों,यह भी जरूरी है। लेकिन क्या गरीबों के सिर से छत छीनकर व्यवस्था सुधारी जा सकती है?
नई सरकार विकास और अनुशासन को लेकर सख्त रुख अपना रही है, लेकिन गरीब तबके का कहना है कि—
पहले पुनर्वास करो, फिर अतिक्रमण हटाओ
गरीबों पर एकतरफा कार्रवाई ना हो
जीविका चलाने के लिए सुरक्षित जगह दी जाए
अधिकारियों पर भी सवाल उठ रहे हैं कि जब वर्षों से ये लोग सड़क किनारे बसे थे, तब प्रशासन सोया क्यों था?
और अब अचानक बिना व्यवस्था किए सब कुछ हटाना किस नीतिगत संवेदनशीलता को दर्शाता है?
सरकार को सोचना होगा—नियमों के साथ इंसानियत भी जरूरी
अभियान के तरीके पर कई सामाजिक संगठनों ने भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि सरकार कानून लागू करे, लेकिन गरीबों का पुनर्वास प्राथमिकता पर हो।गरीबी, बेरोजगारी और महंगाई पहले ही चरम पर है—ऐसे में गरीबों पर बुलडोजर चलाना उनके जीवन को और संकट में डाल देगा।
जरूरत एक संतुलित नीति की
साफ है कि अतिक्रमण हटाना जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है कि—
गरीबों को स्थायी वैकल्पिक जगह मिले
स्ट्रीट वेंडरों के लिए नियमित बाजार क्षेत्र बनाए जाएँ
दुकानदारों को हटा कर उन्हें जगह ढूंढने के लिए उचित समय दिया जाए
पुनर्वास के बाद ही सख्त कार्रवाई की जाए
सरकार को समझना होगा कि सड़कें साफ होना महत्वपूर्ण है,
लेकिन इंसान का जीवन और उसकी रोज़ी–रोटी उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है।
अभी लोग यही उम्मीद कर रहे हैं कि नई सरकार सिर्फ बुलडोजर नहीं चलाएगी—बल्कि गरीबों के लिए भी एक सम्मानजनक और सुरक्षित ठिकाने की व्यवस्था करेगी।