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Bihar News: नौ प्रमंडलों में भूमि-अर्जन प्राधिकरणों को मिले नए पीठासीन पदाधिकारी, मुआवजा मामलों के निस्तारण में तेजी की उम्मीद

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Alam Ki Khabar | Bihar News | Patna News | Bihar Revenue Department | राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग ने नौ प्रमंडलों में भूमि-अर्जन, पुनर्वास एवं पुनर्व्यवस्थापन प्राधिकरणों के लिए नए पीठासीन पदाधिकारियों की नियुक्ति की है।

पटना, 7 अगस्त। बिहार में भूमि-अर्जन से जुड़े मामलों के निस्तारण की प्रक्रिया को गति देने के लिए राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग ने बड़ा प्रशासनिक कदम उठाया है। विभाग ने राज्य के नौ प्रमंडलों में संचालित भूमि-अर्जन, पुनर्वास एवं पुनर्व्यवस्थापन प्राधिकरणों के लिए नए पीठासीन पदाधिकारियों की नियुक्ति की है। इन अधिकारियों के जिम्मे भूमि-अर्जन से जुड़े विवादों की सुनवाई, मुआवजा मामलों के निपटारे और पुनर्वास से संबंधित मामलों पर निर्णय लेने की जिम्मेदारी होगी।

विभाग के इस फैसले को जमीन अधिग्रहण से प्रभावित लोगों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सड़क, रेलवे, सिंचाई, औद्योगिक परियोजनाओं और अन्य सार्वजनिक योजनाओं के लिए जमीन अधिग्रहण के दौरान मुआवजा तथा पुनर्वास को लेकर कई बार विवाद सामने आते हैं। ऐसे मामलों के समय पर निपटारे में प्राधिकरणों की भूमिका अहम होती है।

नियुक्त किए गए अधिकारियों में सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारियों के साथ विभिन्न न्यायिक पदों पर कार्य कर चुके अधिकारी शामिल हैं। मुजफ्फरपुर प्रमंडल के लिए अली अहमद, सेवानिवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, खगड़िया को जिम्मेदारी दी गई है। सारण प्रमंडल में संपूर्णानंद तिवारी, सेवानिवृत्त अध्यक्ष, राज्य परिवहन अपीलीय प्राधिकार, पटना को पीठासीन पदाधिकारी बनाया गया है।

दरभंगा प्रमंडल की जिम्मेदारी देवराज त्रिपाठी को सौंपी गई है, जो पूर्वी चंपारण के सेवानिवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश हैं। भागलपुर प्रमंडल में सेवानिवृत्त प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश, वैशाली विजय आनंद तिवारी को नियुक्त किया गया है।

गया प्रमंडल में विनोद कुमार तिवारी को पीठासीन पदाधिकारी बनाया गया है। वे प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश, दरभंगा के पद पर रह चुके हैं। वहीं, मुंगेर प्रमंडल के लिए गोपालगंज के प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश राकेश मालवीय को जिम्मेदारी दी गई है।

पूर्णिया प्रमंडल में कैमूर के प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश राधे श्याम शुक्ला को नियुक्त किया गया है। कोशी-सहरसा प्रमंडल में नालंदा के प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश हसमुद्दीन अंसारी को पीठासीन पदाधिकारी की जिम्मेदारी दी गई है।

पटना प्रमंडल में कटिहार के प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश हेमंत कुमार त्रिपाठी को नियुक्त किया गया है। इस तरह विभाग ने अलग-अलग प्रमंडलों में भूमि-अर्जन से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए अनुभवी न्यायिक अधिकारियों की तैनाती की है।

किन मामलों पर होगा फैसला?

पीठासीन पदाधिकारियों को भूमि-अर्जन, पुनर्वास एवं पुनर्व्यवस्थापन से संबंधित विवादों की सुनवाई और निस्तारण का अधिकार होगा। इनमें जमीन अधिग्रहण के बदले मिलने वाले मुआवजे से जुड़े विवाद प्रमुख हैं। इसके अलावा अधिनियम के तहत प्राधिकरण के समक्ष संदर्भित मामलों पर भी निर्णय लिया जाएगा।

भूमि अधिग्रहण के बाद प्रभावित परिवारों के पुनर्वास और पुनर्व्यवस्थापन से जुड़े मुद्दे भी इसी प्रक्रिया का हिस्सा होंगे। ऐसे मामलों में फैसला आने से उन लोगों को राहत मिलने की उम्मीद है, जिनके मामले लंबे समय से लंबित हैं।

तीन साल या 65 वर्ष की उम्र तक जिम्मेदारी

नियुक्त किए गए पीठासीन पदाधिकारियों का कार्यकाल पदभार ग्रहण करने की तारीख से तीन वर्ष निर्धारित किया गया है। हालांकि यदि कोई पदाधिकारी इससे पहले 65 वर्ष की आयु पूरी कर लेता है तो उसका कार्यकाल उसी समय समाप्त हो जाएगा। यानी तीन वर्ष और 65 वर्ष की आयु में जो अवधि पहले पूरी होगी, वही कार्यकाल की अंतिम सीमा होगी।

राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री डॉ. दिलीप कुमार जायसवाल ने नियुक्तियों को भूमि-अर्जन से जुड़े मामलों के त्वरित निष्पादन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया है। उनके अनुसार प्राधिकरणों में नए पीठासीन पदाधिकारियों की नियुक्ति से सुनवाई की प्रक्रिया को गति मिलेगी।

प्रभावित लोगों को मिल सकती है राहत

भूमि-अर्जन के मामलों में सबसे बड़ी चुनौती मुआवजा और पुनर्वास से जुड़े विवादों के लंबे समय तक लंबित रहने की होती है। नए पीठासीन पदाधिकारियों की तैनाती से ऐसे मामलों की सुनवाई नियमित होने और लंबित मामलों के निस्तारण में तेजी आने की उम्मीद है।

सरकार की विकास परियोजनाओं के लिए जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया में प्रभावित परिवारों के हितों का संरक्षण भी महत्वपूर्ण है। ऐसे में प्राधिकरणों को सक्रिय करने से एक ओर विकास योजनाओं से जुड़े भूमि-अर्जन मामलों को गति मिल सकती है, वहीं दूसरी ओर मुआवजा और पुनर्वास को लेकर प्रभावित पक्षों को न्यायिक राहत का रास्ता भी अधिक प्रभावी हो सकता है।

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भूमि-अर्जन विवादों के निस्तारण में प्राधिकरणों की भूमिका

भूमि-अर्जन की प्रक्रिया केवल जमीन लेने तक सीमित नहीं होती। इसके साथ जमीन मालिकों को मिलने वाला मुआवजा, प्रभावित परिवारों का पुनर्वास और उनके अधिकारों से जुड़े कई सवाल जुड़े होते हैं। जब किसी मामले में मुआवजे की राशि या पुनर्वास को लेकर विवाद होता है तो उसके निस्तारण के लिए निर्धारित प्राधिकरण महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। नौ प्रमंडलों में नए पीठासीन पदाधिकारियों की नियुक्ति से इन मामलों की सुनवाई को संस्थागत मजबूती मिलने की उम्मीद है। यदि लंबित मामलों की सुनवाई नियमित रूप से होती है तो प्रभावित लोगों को लंबे इंतजार से राहत मिल सकती है और सरकारी परियोजनाओं से जुड़े भूमि-अर्जन मामलों में भी अनिश्चितता कम हो सकती है।

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