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Bihar News: 22 बालूघाटों की पर्यावरणीय मंजूरी में देरी, सरकार को 153 करोड़ का राजस्व नुकसान

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Alam Ki Khabar | Bihar News | Patna News | बिहार के 10 जिलों में 22 बालूघाटों का टीओआर लंबित रहने से पर्यावरणीय स्वीकृति नहीं मिल सकी और सरकार को 153.40 करोड़ रुपये के राजस्व नुकसान का मामला सामने आया।

पटना, 7 अगस्त। बिहार में बालू खनन से जुड़े 22 घाटों की पर्यावरणीय स्वीकृति की प्रक्रिया समय पर पूरी नहीं होने का असर अब सरकारी राजस्व पर भी दिखाई देने लगा है। राज्य के 10 जिलों में चिन्हित इन बालूघाटों का टीओआर लंबे समय से लंबित रहने के कारण खनन गतिविधियां शुरू नहीं हो सकीं। विभागीय समीक्षा में सामने आया कि इससे खान एवं भू-तत्व विभाग को करीब 153.40 करोड़ रुपये के राजस्व की क्षति हुई है।

यह मामला खान एवं भू-तत्व विभाग की समीक्षा बैठक में सामने आया। विभागीय मंत्री डॉ. प्रमोद कुमार की अध्यक्षता में हुई समीक्षा में राजस्व संग्रहण के साथ विभाग के विभिन्न कार्यों और योजनाओं की स्थिति की जानकारी ली गई। इसी दौरान लंबित टीओआर और उससे जुड़े पर्यावरणीय स्वीकृति के मामलों पर अधिकारियों का ध्यान गया।

विभागीय अधिकारियों के अनुसार किसी बालूघाट पर खनन शुरू करने की प्रक्रिया में पर्यावरणीय स्वीकृति महत्वपूर्ण चरण है। इसके लिए सबसे पहले टीओआर यानी टर्म ऑफ रेफरेंस की प्रक्रिया पूरी करनी होती है। इसी के आधार पर संबंधित परियोजना के पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन करने के लिए आवश्यक बिंदु तय किए जाते हैं।

टीओआर की प्रक्रिया पूरी होने के बाद पर्यावरणीय प्रभाव से संबंधित रिपोर्ट तैयार की जाती है। इसके आधार पर आगे पर्यावरणीय स्वीकृति की प्रक्रिया बढ़ती है। ऐसे में टीओआर के स्तर पर होने वाली देरी का सीधा असर बालूघाटों के संचालन पर पड़ता है।

10 जिलों में 22 बालूघाटों की प्रक्रिया लंबित

विभागीय समीक्षा में सामने आए आंकड़ों के मुताबिक सबसे अधिक सात बालूघाट पटना जिले में हैं, जहां टीओआर लंबित है। बांका में चार, जबकि अरवल और वैशाली में दो-दो बालूघाट इस स्थिति में हैं।

इसके अलावा औरंगाबाद, नालंदा, लखीसराय, भागलपुर, पूर्वी चंपारण और सुपौल में एक-एक या दो-दो बालूघाटों की प्रक्रिया लंबित बताई गई है।

जिला-वार स्थिति इस प्रकार है—

• पटना — 7 बालूघाट

• अरवल — 2 बालूघाट

• औरंगाबाद — 1 बालूघाट

• नालंदा — 1 बालूघाट

• बांका — 4 बालूघाट

• लखीसराय — 1 बालूघाट

• भागलपुर — 1 बालूघाट

• पूर्वी चंपारण — 1 बालूघाट

• वैशाली — 2 बालूघाट

• सुपौल — 2 बालूघाट

इस तरह कुल 10 जिलों में 22 बालूघाटों की पर्यावरणीय प्रक्रिया लंबित है।

राजस्व नुकसान के बाद विभाग हुआ सक्रिय

बालूघाटों का संचालन शुरू नहीं होने से सरकार को अपेक्षित खनन राजस्व नहीं मिल सका। समीक्षा में सामने आए 153.40 करोड़ रुपये के नुकसान ने विभागीय स्तर पर लंबित प्रक्रियाओं को तेजी से पूरा करने की जरूरत को सामने ला दिया है।

मंत्री डॉ. प्रमोद कुमार ने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि टीओआर और पर्यावरणीय स्वीकृति से संबंधित मामलों को प्राथमिकता के आधार पर आगे बढ़ाया जाए। संबंधित अधिकारियों को अपने स्तर से प्रगति की नियमित जानकारी राज्य मुख्यालय को उपलब्ध कराने को भी कहा गया है।

टीओआर में देरी पर अब मांगी जाएगी प्रगति रिपोर्ट

विभाग का जोर अब लंबित मामलों को संबंधित स्तरों पर तेजी से आगे बढ़ाने पर है। इसके लिए अधिकारियों से प्रगति रिपोर्ट लेने की व्यवस्था पर भी जोर दिया गया है। उद्देश्य यह है कि जिन बालूघाटों की प्रक्रिया केवल स्वीकृति के अभाव में रुकी हुई है, वहां आवश्यक औपचारिकताएं जल्द पूरी कराई जा सकें।

सरकार के सामने इस मामले में दोहरी चुनौती है। एक तरफ पर्यावरणीय नियमों का पालन करते हुए स्वीकृति की पूरी प्रक्रिया पूरी करनी है, वहीं दूसरी ओर लंबे समय से बंद पड़े या संचालन शुरू नहीं कर सके बालूघाटों से होने वाली राजस्व क्षति को रोकना है।

पर्यावरणीय नियमों के साथ राजस्व पर भी नजर

बालू खनन से जुड़े मामलों में पर्यावरणीय मंजूरी केवल औपचारिक प्रक्रिया नहीं है। खनन से नदी, जलस्तर, तट और आसपास के पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव का आकलन इसी व्यवस्था के तहत किया जाता है। इसलिए विभाग के सामने यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि राजस्व बढ़ाने की कोशिश में पर्यावरणीय मानकों की अनदेखी न हो।

अब 22 बालूघाटों के लंबित टीओआर को आगे बढ़ाने और उसके बाद पर्यावरणीय स्वीकृति की प्रक्रिया पूरी कराने पर विभाग का फोकस है। यदि प्रक्रिया समय पर पूरी होती है तो इन घाटों के संचालन का रास्ता खुल सकता है और सरकार को होने वाली राजस्व क्षति को भी कम किया जा सकेगा।

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बालूघाटों की मंजूरी क्यों अहम?

बिहार में निर्माण गतिविधियों के लिए बालू की मांग लगातार बनी रहती है। ऐसे में अधिकृत बालूघाटों का संचालन सरकार के लिए राजस्व का महत्वपूर्ण स्रोत है। लेकिन किसी घाट को खनन के लिए खोलने से पहले पर्यावरणीय मानकों का पालन जरूरी है। टीओआर इसी पूरी प्रक्रिया की शुरुआती महत्वपूर्ण कड़ी है। यदि इस स्तर पर फाइलें लंबित रहती हैं तो आगे की स्वीकृतियां भी प्रभावित होती हैं और घाट का संचालन शुरू नहीं हो पाता। इस मामले में 10 जिलों के 22 घाटों से जुड़ी प्रक्रिया लंबित रहने के कारण 153.40 करोड़ रुपये के राजस्व नुकसान का आंकड़ा सामने आया है। अब विभाग की प्राथमिकता यह होनी चाहिए कि पर्यावरणीय नियमों का पालन करते हुए लंबित प्रक्रियाओं को समयबद्ध तरीके से पूरा किया जाए। इससे सरकारी राजस्व की संभावित क्षति रोकने के साथ अधिकृत खनन व्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी।

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