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Jamui News: स्ट्रेचर नहीं मिला तो पिता को गोद में लेकर पहुंचा बेटा

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Alam Ki Khabar | Bihar News | Patna News | Samastipur News | जमुई सदर अस्पताल में 75 वर्षीय मरीज को स्ट्रेचर नहीं मिलने पर बेटा गोद में उठाकर सीटी स्कैन कराने पहुंचा। अस्पताल प्रबंधन ने दो ट्रॉली मैन से जवाब मांगा है।

जमुई, 13 अगस्त। आलम की खबर: बिहार की सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में मरीजों को मिलने वाली बुनियादी सुविधाओं को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े हुए हैं। जमुई सदर अस्पताल से सामने आए एक मामले में 75 वर्षीय बीमार पिता को सीटी स्कैन कराने के लिए स्ट्रेचर नहीं मिलने पर उनका बेटा उन्हें अपनी गोद में उठाकर अस्पताल के भीतर ले गया। घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आने के बाद अस्पताल प्रबंधन की व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं।

मामला सोनो प्रखंड के चुरहैत इलाके से जुड़े सदानंद सिंह और उनके 75 वर्षीय पिता रंजय सिंह का बताया जा रहा है। परिजनों के अनुसार, बुजुर्ग मरीज को बुखार और निमोनिया की शिकायत थी। तबीयत खराब होने के बाद उन्हें इलाज के लिए जमुई सदर अस्पताल लाया गया। चिकित्सकीय जांच के बाद डॉक्टर ने उनकी स्थिति को देखते हुए सीटी स्कैन कराने की सलाह दी।

इसके बाद मरीज को जांच केंद्र तक ले जाने की जरूरत पड़ी। परिजन अस्पताल परिसर में स्ट्रेचर तलाशने लगे, लेकिन काफी प्रयास के बावजूद उन्हें तत्काल स्ट्रेचर उपलब्ध नहीं हो सका। मरीज की हालत और जांच में हो रही देरी को देखते हुए बेटे ने आखिरकार अपने पिता को गोद में उठाया और उन्हें लेकर अस्पताल के भीतर पहुंचा।

एक स्ट्रेचर पर शव, दूसरा नहीं मिला

मरीज के बेटे सदानंद सिंह का आरोप है कि उन्होंने अस्पताल में मौजूद लोगों और कर्मचारियों से स्ट्रेचर के बारे में जानकारी मांगी, लेकिन उन्हें कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिला। उनके मुताबिक अस्पताल में एक स्ट्रेचर मौजूद था, लेकिन उस पर पहले से एक शव रखा हुआ था।

ऐसी स्थिति में वह अपने बीमार पिता को उस स्ट्रेचर पर ले जाने के लिए तैयार नहीं हुए। परिजनों ने दूसरे स्ट्रेचर की तलाश की, लेकिन तत्काल कोई व्यवस्था नहीं हो सकी। इसी बीच इलाज और जांच में देरी होती जा रही थी।

सदानंद का कहना है कि परिवार के लोग सामान्य आर्थिक स्थिति से आते हैं और उन्हें काम पर भी जाना था। उनका कहना था कि अगर अस्पताल में मरीजों को एक सामान्य स्ट्रेचर तक उपलब्ध नहीं हो पाएगा तो गंभीर स्थिति में परिजनों की परेशानी और बढ़ जाएगी।

मजबूरी में पिता को गोद में उठाया

जब काफी देर तक स्ट्रेचर नहीं मिला और मरीज को सीटी स्कैन के लिए ले जाना जरूरी था, तब बेटे ने अपने पिता को गोद में उठा लिया। अस्पताल के भीतर इस तरह बीमार बुजुर्ग को ले जाते हुए वीडियो सामने आने के बाद मामला तेजी से चर्चा में आ गया।

यह तस्वीर अस्पताल में किसी बड़ी चिकित्सकीय मशीन या अत्याधुनिक सुविधा की कमी की नहीं, बल्कि मरीज को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने जैसी बेहद बुनियादी जरूरत की है। इसी वजह से घटना ने स्वास्थ्य व्यवस्था की जमीनी स्थिति को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।

मरीज के परिजनों का कहना है कि अस्पताल में इलाज के लिए आने वाले गंभीर और बुजुर्ग मरीजों के लिए स्ट्रेचर या ट्रॉली की उपलब्धता बेहद जरूरी है। यदि परिजनों को खुद मरीज उठाकर ले जाना पड़े तो इससे अस्पताल की व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

वीडियो वायरल होने के बाद अस्पताल प्रशासन हरकत में

घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आने के बाद अस्पताल प्रबंधन ने मामले की जानकारी ली। जमुई सदर अस्पताल के डिप्टी सुपरीटेंडेंट डॉ. तनिष्क कुमार ने बताया कि उन्हें स्ट्रेचर से जुड़ी घटना की जानकारी मिली है।

उन्होंने कहा कि ड्यूटी पर तैनात दो ट्रॉली मैन से स्पष्टीकरण मांगा गया है। उनसे यह पूछा गया है कि आखिर मरीज को जरूरत के समय स्ट्रेचर क्यों उपलब्ध नहीं कराया गया। दोनों कर्मचारियों के जवाब मिलने के बाद मामले की पूरी स्थिति स्पष्ट होगी और उसी के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।

अस्पताल प्रबंधन की ओर से यह जांच ऐसे समय में शुरू की गई है, जब सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो को लेकर लोगों में नाराजगी देखी जा रही है।

सिविल सर्जन ने कैमरे पर बयान नहीं दिया

मामले को लेकर अस्पताल प्रशासन का पक्ष जानने के लिए सिविल सर्जन से भी संपर्क किया गया। हालांकि, कैमरे पर बयान देने से उन्होंने इनकार कर दिया। ऑफ कैमरा उन्होंने बताया कि इस मामले को लेकर बैठक की जा रही है और जो भी दोषी पाया जाएगा, उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

अब जांच का मुख्य सवाल यही है कि उस समय अस्पताल में कितने स्ट्रेचर उपलब्ध थे और उनमें से कितने ड्यूटी पर इस्तेमाल किए जा रहे थे। यदि स्ट्रेचर उपलब्ध था तो मरीज के परिजन तक वह समय पर क्यों नहीं पहुंचा, यह भी जांच का हिस्सा होगा।

अस्पताल में बुनियादी सुविधाओं पर फिर सवाल

जमुई सदर अस्पताल जिले के प्रमुख सरकारी अस्पतालों में शामिल है। ऐसे अस्पताल में बड़ी संख्या में मरीज इलाज और जांच के लिए पहुंचते हैं। यहां आने वाले मरीजों में बुजुर्ग, गंभीर बीमार और ऐसे लोग भी होते हैं जिन्हें खुद चलने में परेशानी होती है।

ऐसे मरीजों को वार्ड, जांच केंद्र, इमरजेंसी या अन्य विभाग तक पहुंचाने में स्ट्रेचर और ट्रॉली की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। इसलिए किसी मरीज को स्ट्रेचर उपलब्ध न होना सिर्फ एक छोटी प्रशासनिक चूक नहीं माना जा सकता।

हालांकि, इस मामले में अंतिम जिम्मेदारी तय होने से पहले अस्पताल प्रबंधन की जांच रिपोर्ट का इंतजार करना जरूरी है। फिलहाल दो ट्रॉली मैन से स्पष्टीकरण मांगा गया है और उनके जवाब के आधार पर आगे की कार्रवाई की बात कही गई है।

सवाल सिर्फ एक परिवार का नहीं

जमुई की यह घटना उस बड़े सवाल की ओर भी ध्यान खींचती है कि सरकारी अस्पतालों में मरीजों के लिए उपलब्ध कराई गई सुविधाएं जरूरत के समय कितनी प्रभावी तरीके से काम करती हैं। अस्पताल में डॉक्टर और जांच की सुविधा होना महत्वपूर्ण है, लेकिन मरीज को डॉक्टर तक पहुंचाने और जांच केंद्र तक ले जाने जैसी बुनियादी व्यवस्थाएं भी उतनी ही जरूरी हैं।

अगर किसी बुजुर्ग मरीज को स्ट्रेचर नहीं मिलता और उसका बेटा उसे गोद में उठाकर ले जाने को मजबूर होता है, तो यह अस्पताल प्रबंधन के लिए व्यवस्था की समीक्षा का अवसर भी है।

फिलहाल अस्पताल प्रशासन ने जांच शुरू कर दी है। अब देखना होगा कि जांच में क्या सामने आता है और क्या मरीजों के लिए स्ट्रेचर की उपलब्धता तथा उसके संचालन की व्यवस्था में कोई ठोस बदलाव किया जाता है।

अस्पतालों में सुविधा सिर्फ कागज पर नहीं, जरूरत के वक्त दिखनी चाहिए

सरकारी अस्पतालों की सफलता का आकलन सिर्फ इस बात से नहीं होना चाहिए कि वहां कितने डॉक्टर हैं, कितनी मशीनें हैं या कितने बेड उपलब्ध हैं। असली परीक्षा तब होती है जब कोई गंभीर या बुजुर्ग मरीज अस्पताल के दरवाजे पर पहुंचता है और उसे तत्काल मदद की जरूरत होती है।

जमुई की घटना में सबसे परेशान करने वाली तस्वीर यह है कि 75 साल के मरीज को जांच के लिए ले जाने के दौरान परिवार को स्ट्रेचर की तलाश करनी पड़ी। अंत में बेटे ने अपने पिता को गोद में उठा लिया। यह स्थिति किसी भी अस्पताल प्रशासन के लिए गंभीर समीक्षा का विषय होनी चाहिए।

स्ट्रेचर जैसी सुविधा को बहुत सामान्य समझकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अस्पताल में हर समय ऐसे मरीज पहुंचते हैं जो खुद चलने की स्थिति में नहीं होते। उनके लिए स्ट्रेचर केवल सुविधा नहीं, इलाज की प्रक्रिया का जरूरी हिस्सा है।

इस मामले में अस्पताल प्रबंधन ने दो ट्रॉली मैन से जवाब मांगा है। जांच के बाद वास्तविक जिम्मेदारी सामने आएगी। लेकिन इसके साथ यह भी जरूरी है कि अस्पताल यह सुनिश्चित करे कि भविष्य में किसी मरीज के परिजन को स्ट्रेचर खोजने के लिए इधर-उधर न भटकना पड़े।

सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में जनता का भरोसा तभी मजबूत होगा, जब मरीज को डॉक्टर, दवा और जांच के साथ-साथ सम्मानजनक और मानवीय व्यवहार भी मिले। एक बुजुर्ग पिता को उसका बेटा गोद में उठाकर ले जाए और अस्पताल की व्यवस्था सिर्फ बाद में जांच शुरू करे—ऐसी तस्वीर दोबारा सामने न आए, यही इस घटना से सबसे बड़ी सीख होनी चाहिए।

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