बिहार में अपराध अब वैसा नहीं रहा, जैसा एक दशक पहले दिखता था। सड़क छिनतई, गिरोहबाज़ी या पारंपरिक अपराध अब पीछे छूट चुके हैं। प्रदेश में आपराधिक प्रवृत्ति का नक्शा पूरी तरह बदल चुका है—और यही बदलाव नई सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। अपराध अब हथियार लेकर भागने वाले गिरोहों से नहीं, बल्कि सूट-बूट पहने व्यवस्थित नेटवर्कों से जन्म ले रहा है। इन नेटवर्कों ने बिहार की जमीन, नदी, निर्माण, खनन और प्रशासन—सबको अपनी पकड़ में लेना शुरू कर दिया है।
भू-माफिया: नए युग का सुपर क्रिमिनल
बिहार में जमीन सिर्फ संपत्ति नहीं, सत्ता बन चुकी है। भू-माफिया की ताकत इस हद तक बढ़ गई है कि वे न सिर्फ एकड़ के एकड़ जमीन खरीद-बेच कर रहे हैं बल्कि सरकारी जमीन, पंचायत परिसंपत्ति, तालाब, चरागाह और स्कूल तक निगलने में लगे हैं। आधुनिक तकनीक से फर्जी कागजात बनाना और बिचौलियों के नेटवर्क के जरिए गरीब और आम नागरिक को बेदखल करना—यह आज के अपराध की नई परिभाषा बन गई है।
राज्य के हर जिले में ऐसी कथाएँ मौजूद हैं जहाँ खून खराबा नहीं होता, फिर भी पूरा परिवार सड़क पर आ जाता है। यही अपराध का सबसे खतरनाक रूप है—दिखाई नहीं देता, पर सबकुछ निगल जाता है।
बालू माफिया: खनन के साथ कानून का भी दोहन
नदी का पानी सूख जाए या कानून सख्त हो जाए—बालू माफिया पर कोई फर्क पड़ता नहीं दिख रहा। अवैध खनन सिर्फ पर्यावरण को तबाह नहीं कर रहा, बल्कि यह पुलिस, प्रशासन और स्थानीय राजनीति के बीच एक ऐसा गठजोड़ खड़ा कर रहा है, जो अपराध को ऑक्सीजन देता है।
खौफ इस कदर है कि कई इलाकों में रात होने के बाद पुलिस भी बिना अतिरिक्त फोर्स के गांवों की तरफ नहीं जाती। यह स्थिति बताती है कि अपराध का असली पूंजीपति कौन है।
भ्रष्टाचार: शांत अपराध, पर असर सबसे व्यापक
बिहार में बढ़ता भ्रष्टाचार अपराध के सबसे खतरनाक रूपों में से एक बन चुका है। यह न गोली से डरता है, न कानून से।
हर फाइल की खामोशी में, हर प्रोजेक्ट की देरी में, हर निविदा की हेराफेरी में—यह अपराध धीरे-धीरे राज्य की जड़ों को खोखला कर रहा है। नई सरकार के लिए यह चुनौती सिर्फ कानून-व्यवस्था की नहीं, बल्कि प्रशासनिक ईमानदारी की पुनर्स्थापना की भी है।
शराब माफिया: प्रतिबंध के बाद पैदा हुई अपराध की नई फसल
शराबबंदी की नीतियों ने एक नया आयाम जोड़ दिया है। प्रतिबंध ने भले ही सामाजिक सुधार का रास्ता खोला, लेकिन इसके समानांतर शराब माफिया का साम्राज्य भी खड़ा हुआ है।
इस साम्राज्य की अपनी अदालतें, अपने सिपाही, अपने रास्ते और अपना खजाना है। बिहार के कई इलाकों में शराबमाफिया का प्रभाव पुलिस की कार्रवाई को खुली चुनौती देता दिखाई देता है।
नई सरकार के लिए कठिन इम्तिहान
बिहार की नई सरकार जिस दौर में सत्ता में आई है, वह सामान्य समय नहीं है। अपराध का ढांचा अब सीधा, स्पष्ट और पारंपरिक नहीं रहा। यह
जमीन
खनन
भ्रष्टाचार
शराब
निर्माण
—इन सभी के बीच फैले उन संगठित तंत्रों से उपजा है, जो कानून से ज्यादा बाजार और राजनीतिक समीकरणों को समझते हैं।
सरकार को यदि अपराध नियंत्रण का नया मॉडल गढ़ना है, तो उसे पुलिस सुधार, पारदर्शी प्रशासन, खनन की निगरानी, भूमि-व्यवस्था में आधुनिक तकनीक और समानांतर अर्थव्यवस्थाओं पर प्रहार—इन सभी मोर्चों पर एक साथ काम करना होगा।
आज बिहार के अपराधी बंदूक नहीं, व्यवसाय चलाते हैं। इसलिए अपराध से लड़ाई अब केवल पुलिस की कार्रवाई नहीं, बल्कि शासन प्रणाली की पुनर्रचना की मांग कर रही है। गौरतलब है कि,बिहार में अपराध की नई तस्वीर डराती नहीं—चिंतन कराती है।अपराध अब सड़क पर नहीं, सिस्टम में पल रहा है।फैसला सरकार को करना है—क्या यह चुनौती सिर्फ कानून-व्यवस्था की फाइल बनेगी, या आने वाले समय में निर्णायक सुधारों का आधार बनेगी?