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Patna High Court News: धार्मिक जुलूस पर पटना हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, आस्था के साथ कानून-व्यवस्था और सुरक्षा भी जरूरी

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Alam Ki Khabar | Bihar News | Patna News | Samastipur News | पटना हाईकोर्ट ने महावीरी जुलूस की अनुमति से जुड़े मामले में कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता मौलिक अधिकार है, लेकिन सार्वजनिक स्वास्थ्य, सुरक्षा, शांति और कानून-व्यवस्था से ऊपर नहीं हो सकती।

डेस्क, पटना, 22 अगस्त। धार्मिक आस्था और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन को लेकर पटना हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि संविधान धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है, लेकिन इस अधिकार को कानून-व्यवस्था, सार्वजनिक स्वास्थ्य, सुरक्षा और सामाजिक शांति से अलग करके नहीं देखा जा सकता। खासकर रिहायशी इलाकों में धार्मिक जुलूस की अनुमति देते समय प्रशासन को आम नागरिकों की सुरक्षा और सामान्य जनजीवन को प्राथमिकता देनी होगी।

यह फैसला सीवान जिले के हथुआरा गांव में प्रस्तावित महावीरी जुलूस से जुड़े मामले में आया। न्यायमूर्ति आलोक कुमार की एकल पीठ ने भदई चौधरी की ओर से दायर याचिका को खारिज करते हुए धार्मिक जुलूस के अधिकार की संवैधानिक सीमा को स्पष्ट किया। याचिका में एक अखाड़े की ओर से करीब 300 लोगों को महावीरी जुलूस में शामिल होने और पारंपरिक मार्ग से जुलूस निकालने की अनुमति देने की मांग की गई थी।

धार्मिक स्वतंत्रता है, लेकिन असीमित अधिकार नहीं

अदालत की टिप्पणी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि धार्मिक स्वतंत्रता को मौलिक अधिकार मानते हुए भी इसे पूर्ण या निरंकुश अधिकार नहीं माना गया। कोर्ट ने कहा कि धार्मिक गतिविधियां समाज के दूसरे लोगों के अधिकारों और सामान्य नागरिक जीवन के साथ तालमेल में होनी चाहिए।

इसका अर्थ यह है कि किसी धार्मिक आयोजन के आयोजक केवल यह कहकर अनुमति का दावा नहीं कर सकते कि आयोजन धार्मिक आस्था से जुड़ा हुआ है। प्रशासन को आयोजन की प्रकृति, संभावित भीड़, मार्ग, इलाके की स्थिति और कानून-व्यवस्था से जुड़े पहलुओं को ध्यान में रखने का अधिकार है।

पटना हाईकोर्ट ने विशेष रूप से सार्वजनिक स्वास्थ्य, सुरक्षा और शांति को धार्मिक जुलूस की अनुमति से जोड़ते हुए प्रशासन की जिम्मेदारी को रेखांकित किया। रिहायशी क्षेत्रों में यह जिम्मेदारी और भी महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि वहां जुलूस का असर सीधे आम लोगों की आवाजाही और दैनिक जीवन पर पड़ सकता है।

सीवान के हथुआरा गांव का क्या है मामला?

मामला सीवान जिले के हथुआरा गांव में हर साल आयोजित होने वाले महावीरी जुलूस से संबंधित है। याचिकाकर्ता भदई चौधरी ने एक अखाड़े की ओर से अदालत का रुख किया था। उनकी मांग थी कि करीब 300 लोगों को जुलूस में शामिल होने की अनुमति दी जाए और जुलूस को उसके पारंपरिक रास्ते से निकाला जाए।

दूसरी ओर, राज्य सरकार ने अदालत में अपने जवाब में पुराने आयोजनों के दौरान सामने आई कानून-व्यवस्था की घटनाओं का उल्लेख किया। सरकार के अनुसार, पूर्व में भीड़ के कारण सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित हुई थी और एक सरकारी वाहन में आग लगाने तथा पुलिस पर पथराव जैसी घटनाएं सामने आई थीं।

यही परिस्थितियां अदालत के सामने इस सवाल को लेकर महत्वपूर्ण बनीं कि क्या धार्मिक जुलूस के लिए किसी खास संख्या में लोगों को शामिल करने या किसी निश्चित मार्ग से जुलूस निकालने को सीधे मौलिक अधिकार का हिस्सा माना जा सकता है।

जुलूस का रूट और भीड़ की संख्या भी प्रशासन तय कर सकता है

अदालत के फैसले से यह संकेत मिला कि धार्मिक आयोजन का मूल अधिकार और उसके आयोजन का तरीका दो अलग-अलग पहलू हैं। धार्मिक आस्था और पूजा-पद्धति का अधिकार संविधान से संरक्षित है, लेकिन कितने लोग जुलूस में शामिल होंगे, जुलूस किस मार्ग से जाएगा और किन परिस्थितियों में आयोजन होगा, इन विषयों पर प्रशासन कानून-व्यवस्था को देखते हुए उचित शर्तें लगा सकता है।

हालिया रिपोर्ट के अनुसार, हथुआरा के इस अखाड़े के जुलूस को लेकर पहले भी प्रतिभागियों की संख्या पर अलग-अलग समय में प्रतिबंध लगाए जाते रहे हैं। याचिकाकर्ता ने पुराने मार्ग और अधिक संख्या में लोगों को शामिल करने की अनुमति बहाल करने की मांग की थी। सरकार ने दूसरी तरफ पिछले अनुभवों और संभावित कानून-व्यवस्था की स्थिति को आधार बनाया।

सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले का भी हवाला

पटना हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के डॉ. एम. इस्माइल फारूकी मामले में दिए गए फैसले का भी संदर्भ लिया। अदालत ने धार्मिक उपासना के अधिकार और किसी विशेष स्थान पर उपासना करने के दावे के बीच अंतर को महत्वपूर्ण माना।

इसी कानूनी सिद्धांत को धार्मिक जुलूस के मामले में लागू करते हुए हाईकोर्ट ने संकेत दिया कि धार्मिक गतिविधि का अधिकार अपने आप में किसी खास सार्वजनिक स्थान, मार्ग या व्यवस्था पर बिना शर्त दावा करने का अधिकार नहीं बन जाता।

इस दृष्टिकोण से देखा जाए तो जुलूस निकालने की धार्मिक परंपरा और जुलूस के लिए सार्वजनिक सड़क, रूट या अन्य नागरिक सुविधाओं के इस्तेमाल को अलग-अलग कानूनी कसौटियों पर देखा जा सकता है।

धर्मनिरपेक्षता और नागरिक जीवन पर कोर्ट की टिप्पणी

पटना हाईकोर्ट ने धर्मनिरपेक्षता को संविधान की मूल संरचना का हिस्सा बताते हुए कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता जब सामान्य नागरिक जीवन और सार्वजनिक सुविधाओं को प्रभावित करती है, तो उस पर संविधान के तहत उचित प्रतिबंध लागू हो सकते हैं।

अदालत की यह टिप्पणी ऐसे आयोजनों के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है, जहां बड़ी संख्या में लोग सार्वजनिक स्थानों पर एकत्र होते हैं। धार्मिक आयोजन के दौरान श्रद्धालुओं की आस्था का सम्मान जरूरी है, लेकिन साथ ही सड़क पर चलने वाले लोगों, स्थानीय निवासियों, दुकानदारों, आपातकालीन सेवाओं और सुरक्षा व्यवस्था का भी ध्यान रखना प्रशासन की जिम्मेदारी है।

प्रशासन के लिए क्या संदेश?

इस फैसले से प्रशासन के लिए यह बात स्पष्ट होती है कि धार्मिक जुलूस की अनुमति देते समय केवल परंपरा या धार्मिक भावना को आधार नहीं बनाया जा सकता। स्थानीय परिस्थितियों, पूर्व की घटनाओं, भीड़ की संभावित संख्या, जुलूस के मार्ग और सुरक्षा व्यवस्था का आकलन भी जरूरी होगा।

वहीं, धार्मिक संगठनों और आयोजकों के लिए भी यह फैसला इस बात का संकेत है कि मौलिक अधिकारों के साथ जिम्मेदारियां भी जुड़ी होती हैं। यदि किसी आयोजन के कारण दूसरे नागरिकों के अधिकार, सुरक्षा या सामान्य जीवन पर गंभीर असर पड़ने की आशंका हो, तो प्रशासन उचित शर्तें लगा सकता है।

आस्था और व्यवस्था के बीच संतुलन ही रास्ता

पटना हाईकोर्ट के फैसले का व्यापक संदेश यही है कि धार्मिक स्वतंत्रता और सार्वजनिक व्यवस्था को एक-दूसरे के विरोध में खड़ा करने के बजाय दोनों के बीच संतुलन बनाया जाना चाहिए। संविधान नागरिकों को धर्म मानने और धार्मिक गतिविधियों का अधिकार देता है, लेकिन उसी संविधान में सार्वजनिक व्यवस्था, स्वास्थ्य और सुरक्षा की रक्षा के लिए उचित प्रतिबंधों की गुंजाइश भी मौजूद है।

सीवान के हथुआरा गांव से जुड़े इस मामले में अदालत ने फिलहाल 300 लोगों के जुलूस और पारंपरिक मार्ग की मांग को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जुलूस में कितने लोगों को अनुमति दी जाए, इसका फैसला संबंधित समय की कानून-व्यवस्था की स्थिति को देखकर प्रशासन कर सकता है।

इस तरह यह फैसला केवल एक महावीरी जुलूस की अनुमति का मामला नहीं रह जाता, बल्कि यह बताता है कि धार्मिक अधिकारों का इस्तेमाल नागरिक व्यवस्था और दूसरे लोगों के अधिकारों के साथ संतुलन बनाकर किया जाना चाहिए।

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विशेष टिप्पणी

आस्था का सम्मान, लेकिन नागरिक सुरक्षा भी जरूरी

भारत जैसे विविधताओं वाले देश में धार्मिक आयोजन सामाजिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। लोगों की आस्था और परंपराओं का सम्मान लोकतांत्रिक व्यवस्था की जिम्मेदारी है। लेकिन सार्वजनिक सड़क, बाजार और रिहायशी इलाकों में होने वाला कोई भी बड़ा आयोजन केवल आयोजकों तक सीमित नहीं रहता। उसका प्रभाव वहां रहने वाले हर व्यक्ति पर पड़ता है।

पटना हाईकोर्ट का फैसला इसी संतुलन की ओर इशारा करता है। धार्मिक स्वतंत्रता को कमजोर करना अदालत का उद्देश्य नहीं है, बल्कि यह स्पष्ट करना है कि मौलिक अधिकारों के साथ सामाजिक जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है।

सबसे बेहतर रास्ता यही है कि प्रशासन धार्मिक संगठनों के साथ पहले से संवाद करे, जुलूस का मार्ग तय करे, भीड़ की सीमा निर्धारित करे और सुरक्षा की पर्याप्त व्यवस्था करे। वहीं आयोजकों को भी प्रशासन द्वारा तय शर्तों का पालन करना चाहिए।

आस्था और कानून-व्यवस्था को आमने-सामने खड़ा करने के बजाय दोनों के बीच समन्वय बनाया जाए तो धार्मिक परंपराएं भी कायम रह सकती हैं और आम नागरिकों की सुरक्षा तथा शांति भी बनी रह सकती है।

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