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Business | सुभाष चंद्रा के ₹22 हजार करोड़ के मामले में बड़ा मोड़, ₹6.25 करोड़ वाले रीपेमेंट प्लान पर NCLT ने लगाई रोक

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Alam Ki Khabar | Bihar News | Patna News | Samastipur News | सुभाष चंद्रा के पर्सनल इनसॉल्वेंसी मामले में NCLT की पांच सदस्यीय पीठ ने ₹6.25 करोड़ के रीपेमेंट प्लान पर रोक लगाई, अब आगे की सुनवाई में मामला तय होगा।

नई दिल्ली, 1 सितंबर। एस्सेल ग्रुप के चेयरमैन सुभाष चंद्रा से जुड़े व्यक्तिगत इनसॉल्वेंसी मामले में NCLT की पांच सदस्यीय पीठ के हस्तक्षेप के बाद मामला एक बार फिर चर्चा में आ गया है। पीठ ने उस आदेश पर फिलहाल रोक लगा दी है, जिसके जरिए सुभाष चंद्रा के रीपेमेंट प्लान को मंजूरी दी गई थी। इस योजना के तहत करीब ₹22,006.57 करोड़ के स्वीकार किए गए दावों के सामने केवल ₹6.25 करोड़ का भुगतान प्रस्तावित था। इसके अतिरिक्त इनसॉल्वेंसी प्रक्रिया के खर्च के लिए ₹25 लाख अलग रखे गए थे।

मामले में पीठ ने संबंधित सभी पक्षों को नोटिस जारी करते हुए जवाब मांगा है। इसका सीधा मतलब यह है कि पहले मंजूर किया गया रीपेमेंट प्लान अभी प्रभावी नहीं होगा। जब तक पांच सदस्यीय पीठ इस विवाद पर अंतिम फैसला नहीं देती, तब तक उस मंजूरी के आधार पर आगे की प्रक्रिया नहीं बढ़ेगी।

सुभाष चंद्रा पर इतना बड़ा दावा क्यों?

यहां सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि ₹22 हजार करोड़ से अधिक की रकम को सुभाष चंद्रा का व्यक्तिगत बैंक लोन समझना सही नहीं होगा। यह रकम एस्सेल ग्रुप से जुड़ी कंपनियों द्वारा लिए गए कर्ज से संबंधित है।

इन कंपनियों के कर्ज के लिए सुभाष चंद्रा ने व्यक्तिगत गारंटी दी थी। कंपनी के कर्ज की अदायगी में परेशानी आने के बाद कर्जदाताओं ने व्यक्तिगत गारंटी के आधार पर उनके खिलाफ IBC के तहत कार्रवाई शुरू की।

इसी प्रक्रिया में वित्तीय संस्थानों और बैंकों की ओर से किए गए कुल दावों में से लगभग ₹22,006.57 करोड़ के क्लेम स्वीकार किए गए।

इसके बाद सुभाष चंद्रा की ओर से कर्ज चुकाने की योजना सामने रखी गई। इसमें कर्जदाताओं को ₹6.25 करोड़ देने का प्रस्ताव था। इसके अलावा ₹25 लाख इनसॉल्वेंसी प्रक्रिया से जुड़े खर्च के लिए रखे गए थे।

यानी कुल प्रस्तावित राशि करीब ₹6.50 करोड़ थी।

कर्जदाताओं के बीच क्यों हुआ विवाद?

रीपेमेंट प्लान को करीब 80.81 प्रतिशत वोटिंग शेयर का समर्थन मिला था। लेकिन सभी कर्जदाता इससे सहमत नहीं थे।

IBC में वोटिंग शेयर सामान्य तौर पर स्वीकार किए गए दावे की रकम से जुड़ा होता है। इसलिए ज्यादा रकम का दावा रखने वाले कर्जदाता का वोटिंग प्रभाव भी अधिक होता है।

कुछ वित्तीय संस्थानों ने इस योजना पर गंभीर आपत्ति जताई। उनका तर्क था कि हजारों करोड़ रुपये के स्वीकार किए गए दावों के मुकाबले महज कुछ करोड़ रुपये की रिकवरी कर्जदाताओं के हितों को पर्याप्त रूप से सुरक्षित नहीं करती।

LIC Housing Finance सहित कुछ बड़े कर्जदाताओं ने भी इस व्यवस्था का विरोध किया। LIC Housing Finance का स्वीकार किया गया दावा करीब ₹1,322 करोड़ बताया गया, जबकि प्रस्तावित योजना के तहत उसकी रिकवरी लगभग ₹38 लाख के आसपास रहने की बात सामने आई।

हालांकि, सिक्योर्ड संपत्तियों से जुड़े कुछ अधिकार अलग बने रहने की बात भी सामने आई थी।

दो सदस्यीय पीठ से शुरू हुआ विवाद

मामला शुरू में NCLT की दो सदस्यीय पीठ के सामने था। दोनों सदस्यों की राय एक जैसी नहीं रही। एक सदस्य ने रीपेमेंट प्लान को स्वीकार करने के पक्ष में राय नहीं दी, जबकि दूसरे सदस्य का रुख अलग था।

मतभेद के कारण मामला तीसरे सदस्य के पास भेजा गया। तीसरे सदस्य ने रीपेमेंट प्लान को मंजूरी देने की राय व्यक्त की।

इसके बाद कानूनी विवाद का सबसे अहम सवाल सामने आया—क्या अलग-अलग राय आने की स्थिति में तीसरे सदस्य की राय को बहुमत का फैसला माना जा सकता है?

यही मुद्दा आगे चलकर पांच सदस्यीय पीठ के गठन का आधार बना।

पांच सदस्यीय पीठ क्यों बनी?

तीन सदस्यों की राय से स्पष्ट बहुमत नहीं बनने के बाद मामले में निर्णय का गतिरोध पैदा हो गया। इसी स्थिति को दूर करने के लिए NCLT की ओर से पांच सदस्यीय विशेष पीठ का गठन किया गया।

अब यही पीठ यह तय करेगी कि सुभाष चंद्रा के रीपेमेंट प्लान को दी गई मंजूरी कानून के मुताबिक कायम रह सकती है या नहीं।

साथ ही यह भी महत्वपूर्ण होगा कि यदि प्लान को मंजूरी मिलती है तो इसका विरोध करने वाले कर्जदाताओं के अधिकार किस हद तक प्रभावित होंगे।

अभी ₹6.25 करोड़ का प्लान लागू नहीं

पांच सदस्यीय पीठ के ताजा आदेश के बाद फिलहाल ₹6.25 करोड़ वाला भुगतान प्लान लागू नहीं माना जाएगा। यानी सुभाष चंद्रा की ओर से प्रस्तावित इस भुगतान के आधार पर इनसॉल्वेंसी मामला अंतिम रूप से समाप्त नहीं हुआ है।

पीठ ने सभी संबंधित पक्षों को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया है। इसके बाद दलीलों और दस्तावेजों के आधार पर आगे का आदेश जारी किया जाएगा।

संपत्ति को लेकर भी सख्ती

मामले में संपत्तियों को लेकर भी महत्वपूर्ण निर्देश दिए गए हैं। अंतिम निर्णय आने तक गारंटर से जुड़ी संपत्तियों की बिक्री या हस्तांतरण को लेकर रोक रहेगी।

इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मामले का फैसला होने से पहले ऐसी संपत्तियों की स्थिति में कोई बड़ा बदलाव न हो, जिससे कर्जदाताओं के अधिकार प्रभावित हों।

NCLAT में भी पहुंचा मामला

NCLT की कार्यवाही के साथ-साथ मामला NCLAT तक भी पहुंच चुका है। कुछ कर्जदाताओं ने पहले दिए गए आदेश को चुनौती दी है। ऐसे में अब इस विवाद की कानूनी दिशा NCLT और NCLAT की आगे की कार्यवाही से तय होगी।

मामले की अगली कार्यवाही 2 सितंबर 2026 को होने की बात कही गई है। इस दौरान संबंधित पक्ष अपना जवाब और दलीलें रख सकते हैं।

आगे क्या होगा?

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि पांच सदस्यीय पीठ ₹6.25 करोड़ वाले रीपेमेंट प्लान को स्वीकार करती है या इसे दोबारा विचार के लिए भेजती है। यदि योजना कायम रहती है तो सुभाष चंद्रा की व्यक्तिगत इनसॉल्वेंसी प्रक्रिया एक अलग दिशा में आगे बढ़ेगी। वहीं यदि कर्जदाताओं की आपत्तियों को महत्व मिलता है तो उनके लिए अतिरिक्त रिकवरी या अन्य कानूनी रास्तों की संभावनाएं खुल सकती हैं।

इस मामले को इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि इसमें व्यक्तिगत गारंटी देने वाले प्रमोटर और कर्जदाताओं के अधिकारों से जुड़े कई महत्वपूर्ण कानूनी सवाल शामिल हैं। खासकर तब, जब स्वीकार किए गए दावों और प्रस्तावित भुगतान के बीच बहुत बड़ा अंतर हो।

फिलहाल पांच सदस्यीय पीठ की रोक के बाद स्थिति स्पष्ट है कि ₹6.25 करोड़ का रीपेमेंट प्लान अभी लागू नहीं होगा और सुभाष चंद्रा से जुड़े मामले में अंतिम फैसला आगे की सुनवाई के बाद ही होगा।

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संपादकीय टिप्पणी

सुभाष चंद्रा से जुड़ा यह मामला सिर्फ एक कारोबारी विवाद नहीं है, बल्कि देश में व्यक्तिगत गारंटी और इनसॉल्वेंसी कानून की व्यावहारिक स्थिति को समझने के लिए भी महत्वपूर्ण है। एक तरफ कर्जदाताओं के सामने हजारों करोड़ रुपये के दावे हैं, वहीं दूसरी तरफ प्रस्तावित भुगतान बेहद कम है। ऐसे मामलों में यह देखना जरूरी होता है कि कर्जदाताओं की सामूहिक मंजूरी किस सीमा तक किसी योजना को वैध बनाती है और असहमति रखने वाले कर्जदाताओं के अधिकारों की सुरक्षा कैसे होती है।

पांच सदस्यीय पीठ का गठन इस बात का संकेत है कि मामले में कानूनी व्याख्या को लेकर गंभीर मतभेद हैं। अब आने वाला फैसला न केवल सुभाष चंद्रा मामले की दिशा तय करेगा, बल्कि भविष्य में इसी तरह के व्यक्तिगत गारंटी वाले इनसॉल्वेंसी मामलों के लिए भी मिसाल बन सकता है।

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