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बिहार में बढ़ते अपराध के पीछे पुलिस-जनता के कमजोर होते तालमेल और सिस्टम में दलालों की बढ़ती सक्रियता को कारण माना जा रहा

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बिहार के किसी भी जिले में आज अपराध का ग्राफ लगातार ऊपर जा रहा है। सवाल उठता है—आख़िर वजह क्या है? क्या सिस्टम कमजोर हो गया, या अपराधी ज्यादा चालाक? लेकिन सच कहीं अधिक गहरा है।आज की सबसे बड़ी समस्या है—पुलिस और अच्छे नागरिकों के बीच बढ़ती दूरी।

जब पुलिस के दोस्त अच्छे लोग थे, तब अपराध नियंत्रण में था

एक ज़माना था जब थाना से लेकर जिला मुख्यालय तक हर स्तर पर विश्वसनीय मुखबिरों का मजबूत नेटवर्क मौजूद हुआ करता था,मुखबिर हर गतिविधि पर नज़र रखते थे।पुख्ता सूचना सीधे पुलिस अधिकारियों तक पहुँचती थी।

अपराधी को पता भी नहीं चलता और कार्रवाई हो जाती थी।इसीलिए अपराध कम होता था, और होता भी था तो तुरंत उद्भेदन भी हो जाता था।

लेकिन अब तस्वीर बदल चुकी है…

समय बदला, व्यवस्था बदली—और दुर्भाग्य से पुलिस की प्राथमिकताएँ भी बदल गईं।आज स्थित यह है कि

पुलिस पदाधिकारी अच्छे और ईमानदार लोगों से दूरी बना रहे हैं।
और उल्टा ग़लत तत्वों को अपना दोस्त समझ बैठते हैं।

असली मुखबिर दूर हो गए, और उनकी जगह दलालों ने ले ली।

परिणाम?जो दलाल कहता है, वही थानेदार बोलता है।जो दलाल चाहता है, वही कार्रवाई होती है।यह सीधा-सीधा अपराधियों को सुरक्षा कवच देता है।

थानों में दलालों का कब्ज़ा—सबसे बड़ा खतरा

आज बिहार के लगभग हर थाने में आपको ऐसे स्थायी दलाल मिल जाएंगे जो खुद को थाना का ‘सुपर बॉस’ समझते हैं।यह तय करते हैं कि किसकी शिकायत सुनी जाए,किसे अनदेखा किया जाए,और अपराधी को कैसे बचाया जाए,जब पुलिस का विवेक दलालों के हाथ में आ जाए, तो अपराध का बढ़ना कोई चौंकाने वाली बात नहीं।

पुलिस-जनता की दूरी ही अपराध बढ़ने का सबसे बड़ा कारण

अगर पुलिस ईमानदार और अच्छे लोगों से बात करना बंद कर दे,
अगर वास्तविक मुखबिरों से दूरी बना ले,और दलालों व अपराधियों को साथी बना ले—तो फिर अपराध क्यों न बढ़े?

आज बिहार की सबसे बड़ी जरूरत यही है कि पुलिस अपने पुराने सिस्टम में लौटे—जहाँ भरोसेमंद मुखबिरी तंत्र मजबूत था, और अपराधी हमेशा दहशत में रहते थे।

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