बिहार सरकार ने राज्यों के सभी अंचल कार्यालयों में प्रत्येक शनिवार जनता दरबार लगाने का निर्देश देकर आम जन की सुगमता को बढ़ाने का प्रयास किया है। इन दरबारों में विशेषकर जमीन-संबंधी शिकायतों का निस्तारण अंचलाधिकारी (CO) द्वारा किए जाने का प्रावधान है ताकि नागरिकों को विवाद सुलझाने के लिए बार-बार भटकना न पड़े।
हालाँकि, धरातल पर सरकार की इस जिम्मेदारी और जनता की वास्तविक सुविधा में बड़ा फर्क दिखाई दे रहा है। हमारे दौरे और स्थानीय लोगों की शिकायतों के आधार पर कई अंचल कार्यालयों पर जनता को बैठने के लिए कुर्सियों/बैंचों की कमी के कारण ज़मीन पर बैठना पड़ रहा है — जिसमें अधिकतर बुज़ुर्ग और महिलाएँ शामिल हैं। स्थानीय लोगों ने इसे प्रशासनिक उदासीनता और संवेदनहीनता करार दिया है।
जनता की मुश्किलें — “बुज़ुर्ग धरती पर, बाबू कुर्सी पर”
स्थानीय निवासी राधाकिशन, एवं नंदकिशोर राय कहते हैं, “हम खेतों-गाँव से आकर अपने जमीन के मामले के लिए आते हैं। अंचल कार्यालय में बैठे-बैठे हमें धूप/ठंड में ज़मीन पर ही बैठना पड़ता है, महिलाओं और बुज़ुर्गों के लिए यह असहनीय है।दूसरी ओर, एक महिला आशा, सीता दवी ने बताया कि कई बार उनकी बारी देर से आती है और बैठने की कोई वयवस्था न होने से उन्हें वापस लौटना पड़ा।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि कार्यालय के कर्मचारी आराम से कुर्सियों पर बैठे रहते हैं, जबकि आम जनता असुविधा झेल रही है। यह स्थिति सरकार की योजनाओं और उनके क्रियान्वयन के बीच अंतर को उजागर करती है।
क्या कहा गया — प्रशासनिक जवाबदेही पर उठे सवाल
अंचल कार्यालयों में बैठने की व्यवस्था न होने से न केवल लोगों की असुविधा बढ़ती है, बल्कि बूढ़े और असहाय नागरिकों के स्वास्थ्य व सम्मान पर भी असर पड़ता है। शासन-प्रशासन की नीयत पर वही प्रश्न उठता है जो हमेशा आवश्यक होता है — क्या योजनाएँ कागज़ों तक सीमित रह जाती हैं या उनका असर जनता तक पहुँचता है?
हमने संबंधित अंचलाधिकारियों और जिला प्रशासन से प्रतिक्रियाएँ लेने का प्रयास किया, पर पदाधिकारियों से प्राप्त आधिकारिक टिप्पणी इस रिपोर्ट के प्रकाशन तक नहीं मिल पाई है। जैसे ही प्रशासन से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया प्राप्त होगी, उसे खबर में जोड़ दिया जाएगा।
सुधार-सुझाव (प्रस्तावित कार्रवाई
स्थानीय स्तर पर समस्या के शीघ्र समाधान के लिए कुछ व्यावहारिक सुझाव दिए जा सकते हैं:प्रत्येक अंचल कार्यालय में जनता दरबार के लिए न्यूनतम 20–30 बैठने की व्यवस्था (बेंच/कुर्सी) अनिवार्य की जाए।
बुज़ुर्गों, गर्भवती महिलाओं और दिव्यांगों के लिए प्राथमिकता कतार और शेड/छाता की व्यवस्था की जाए।
अंचलाधिकारियों के समक्ष मासिक ऑडिट/फीडबैक रखा जाए ताकि शिकायतों के क्रमिक हल का हिसाब रहे।
यदि संसाधन कम हैं तो पंचायत स्तर पर बारी-बारी से समुचित बैठने की व्यवस्था करने का निर्देश जारी किया जाए। गौरतलब है कि,बिहार सरकार का जनता दरबार लगाने का कदम सराहनीय है पर जब जनता-सुविधा (विशेषकर बुज़ुर्ग और महिलाएँ) के लिये आवश्यक आधारभूत इंतजाम नहीं होंगे, तो यह पहल अपने उद्देश्य में अधूरी ही रहेगी। प्रशासन से अपेक्षा है कि वे शीघ्र ही बैठने व प्राथमिकता संबंधी व्यवस्था कराकर इस कमी को दूर करें, अन्यथा सरकार की योजनाओं का लाभ ही सवालों के घेरे में आ जाएगा।