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समस्तीपुर में एड्स दिवस की रैली विवादों में घिरी: “अगर पति आवारा है, तो कंडोम ही सहारा है” नारे पर जिले में गरमाई बहस, जागरूकता और मर्यादा पर उठे सवाल

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समस्तीपुर।विश्व एड्स दिवस के अवसर पर जिले में निकाली गई जागरूकता रैली ने इस बार एक अलग ही मोड़ ले लिया। छात्राओं द्वारा लगाए गए एक नारे—
“अगर पति आवारा है, तो कंडोम ही सहारा है”ने समस्तीपुर को चर्चा और विवाद के केंद्र में ला खड़ा किया है।
जहाँ यह रैली एड्स के प्रति जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से निकाली गई थी, वहीं इस नारे ने जिले की सामाजिक, शैक्षणिक और प्रशासनिक संवेदनशीलता पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।

समाज में दो तरह की राय—जागरूकता या असंवेदनशीलता?

इस नारे के बाद जिले में बहस दो भागों में बंट गई है।एक पक्ष का कहना है कि एड्स जैसी घातक बीमारी से लड़ने के लिए खुलकर बातें करना ज़रूरी है, और इस तरह के नारे लोगों का ध्यान खींचते हैं।
दूसरा पक्ष इसे अभद्र, असंवेदनशील और विद्यालयीन वातावरण के खिलाफ बता रहा है।अभिभावकों का माना है कि नारा भले जागरूकता के उद्देश्य से हो, लेकिन स्कूल की छात्राओं से ऐसी पंक्तियाँ बुलवाना उचित नहीं, खासकर ऐसे सामाजिक माहौल में जहाँ मर्यादा और भाषा को लेकर संवेदनशीलता अधिक है।

कौन ज़िम्मेदार? तैयारी में चूक या समझ की कमी?

प्रशासन और आयोजन करने वाले विभाग पर भी सवाल उठ रहे हैं।
आख़िर यह नारा रैली से पहले किसने तय किया?क्या अधिकारियों ने इसे पहले पढ़ा या समीक्षा की?
क्या बच्चों को ऐसे वाक्यांश समझाने से पहले उनकी उम्र, सामाजिक प्रभाव, परिवार और स्थानीय परिस्थितियों पर विचार किया गया?

उद्देश्य सही, तरीका विवादित

सामाजिक विशेषज्ञ मानते हैं कि
एड्स रोकथाम के लिए कंडोम उपयोग पर जागरूकता बेहद ज़रूरी है, लेकिन भाषा का चयन उतना ही संवेदनशील होना चाहिए।
जागरूकता का संदेश तब सफल होता है, जब वह समाज के हर वर्ग द्वारा सहजता से स्वीकार किया जा सके।ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि “जागरूकता” के नाम पर कहीं “अत्यधिक साहस” बच्चों पर थोप तो नहीं दिया गया?

रैली से निकला संदेश या बवाल?

जिले में लोग सोशल मीडिया से लेकर बाज़ार तक इस नारे पर चर्चा कर रहे हैं।कुछ इसे “कड़वी लेकिन सच्चाई बयान करने वाली पंक्ति” कह रहे हैं, जबकि अन्य इसे “बच्चों के मुख से अनुचित शब्द कहलवाने का उदाहरण” बता रहे हैं।विवाद बढ़ता देख कई संगठनों ने प्रशासन से पूरे कार्यक्रम की समीक्षा और भविष्य में ऐसी “भाषाई चूक” न होने की व्यवस्था करने की मांग उठाई है।

निष्कर्ष: संवेदनशील विषयों पर संतुलन बेहद ज़रूरी

एड्स जागरूकता जैसे गंभीर मुद्दे पर काम करना सराहनीय है, लेकिन समाज की नब्ज़ को समझे बिना दिए गए संदेश यूँ ही बवाल का कारण बन जाते हैं।समस्तीपुर की यह घटना उसी का उदाहरण है।उद्देश्य नेक था, लेकिन प्रस्तुति ने विवाद खड़ा कर दिया।

अब देखना यह है कि प्रशासन इस मामले को किस तरह संभालता है और आगे के कार्यक्रमों में जागरूकता और संयम, दोनों की बराबर अहमियत सुनिश्चित की जाती है या नहीं।

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