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शिक्षा व्यवस्था पर उठते सवाल: सेवा नहीं, व्यवसाय बनता जा रहा है शिक्षा क्षेत्र

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एजेंसी:देश में शिक्षा का स्वरूप तेजी से बदलता जा रहा है। कभी बच्चों के सर्वांगीण विकास और समाज निर्माण का आधार मानी जाने वाली शिक्षा आज कई स्थानों पर सिर्फ व्यवसाय का साधन बनकर रह गई है। निजी संस्थानों से लेकर कोचिंग सेंटर तक, हर जगह मनमानी फीस, प्रतिस्पर्धा की आड़ में दबाव, और शिक्षा के नाम पर वाणिज्यिककरण का चेहरा साफ दिखाई दे रहा है।

निजी स्कूलों की बढ़ती फीस पर अभिभावकों की नाराज़गी:

अभिभावकों का आरोप है कि निजी स्कूल हर साल बिना किसी स्पष्ट कारण के फीस बढ़ा देते हैं,
एडमिशन शुल्क, डेवलपमेंट चार्ज, लैब शुल्क, कंप्यूटर शुल्क जैसे कई मदों में मनमानी वसूली की शिकायतें लगातार बढ़ रही हैं।अभिभावकों का कहना है कि शिक्षा अब सेवा नहीं, “हाई-प्रोफाइल बिजनेस मॉडल” बन चुकी है।

कोचिंग संस्थानों की चमक-दमक के पीछे सवाल:

बड़े-बड़े होर्डिंग और आकर्षक विज्ञापन लगाकर कोचिंग संस्थान छात्रों को आकर्षित करते हैं, लेकिन परिणाम उतने संतोषजनक नहीं दिखते।100% सफलता” या “गारंटीड रिजल्ट” जैसे नारे माता-पिता को भ्रमित करते हैं।शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि कोचिंग इंडस्ट्री का दायरा इतना बड़ा हो गया है कि यह अब एक मल्टी-करोड़ रुपए का कारोबार बन चुका है।

सरकारी स्कूलों की स्थिति और चिंताएं:

निजी शिक्षा के बढ़ते प्रभाव के बीच सरकारी स्कूल लगातार उपेक्षा का शिकार हो रहे हैं।कई स्कूलों में शिक्षकों की कमी, अधूरा इंफ्रास्ट्रक्चर और पढ़ाई का कमजोर स्तर गंभीर चिंता का विषय है।
विशेषज्ञों के अनुसार, सरकारी स्कूलों में सुधार के बिना शिक्षा में समानता की अवधारणा अधूरी रहेगी।

शिक्षा के मूल उद्देश्य पर बहस तेज,

शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान देना, चरित्र निर्माण और समाज को दिशा प्रदान करना रहा है।लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में यह उद्देश्य वाणिज्यिक दबाव के कारण कमजोर होता जा रहा है।बच्चों पर बढ़ता अकादमिक बोझ, महंगी फीस और प्रतिस्पर्धा का असंतुलन मानसिक तनाव को भी बढ़ा रहा है।

सरकार और समाज से अपेक्षा

विशेषज्ञों का कहना है कि शिक्षा क्षेत्र में पारदर्शी फीस नीति,कोचिंग संस्थानों के लिए कड़े दिशानिर्देश,और सरकारी स्कूलों में गुणवत्ता सुधार अत्यंत आवश्यक है।
केवल तभी शिक्षा अपने मूल स्वरूप में लौट सकती है और प्रत्येक बच्चे को समान अवसर मिल सकता है।
गौरतलब है कि,शिक्षा सेवा है, व्यवसाय नहीं।यदि समय रहते शिक्षा क्षेत्र में सुधार नहीं किया गया,
तो आने वाली पीढ़ियाँ केवल प्रतिस्पर्धा और खर्चों के बोझ में दबकर रह जाएँगी।समय की मांग है कि शिक्षा को व्यवसायिकता से बाहर निकालकर इसके मूल उद्देश्य ज्ञान, संस्कार और विकास की ओर वापस लौटाया जाए।

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