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खबर छपते ही खानापूर्ति—अवैध नर्सिंग होम पर असली कार्रवाई कब?

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स्वास्थ्य विभाग की 'खानापूर्ति' आखिर कब तक चलेगी!
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समस्तीपुर जिले में स्वास्थ्य व्यवस्था एक खतरनाक मोड़ पर खड़ी है। रोसड़ा, दलसिंहसराय, हसनपुर, सिंहिया, शिवाजीनगर और विभूतिपुर—हर क्षेत्र में अवैध नर्सिंग होम बिना रोक-टोक फल-फूल रहे हैं। बिना रजिस्ट्रेशन, बिना योग्य डॉक्टर, बिना उपकरणों के—लेकिन इलाज ऐसे जारी जैसे कोई कानून ही न हो। इन नर्सिंग होमों में मरीजों की जिंदगी पर होने वाला यह खेल कोई नई बात नहीं, बल्कि वर्षों से जारी एक खुला राज़ है। सवाल यह नहीं कि अवैध नर्सिंग होम कितने हैं; सवाल यह है कि इन सबको देखने वाला स्वास्थ्य विभाग आखिर कहाँ है?

जो विभाग जनता की जान की सुरक्षा के लिए है, वही विभाग जब लगातार चुप रहे, तो चुप्पी भी अपराध का हिस्सा लगने लगती है। पिछले कई वर्षों में जिले में बड़े-बड़े अभियान चलाने के दावे हुए, लेकिन नतीजा? आज तक किसी बड़े अवैध नर्सिंग होम पर न ठोस कार्रवाई हुई, न सीलिंग, न एफआईआर। विभाग की गतिविधियाँ सिर्फ फाइलों और मीटिंगों के पन्नों में सीमित दिखती हैं, ज़मीन पर नहीं।

और जब मीडिया बार-बार सवाल उठाता है, ख़बरें छापता है, तब विभाग का एक जाना-पहचाना पैटर्न सामने आता है—खानापूर्ति का दौरा। खबर छपते ही विभाग के कुछ कर्मचारी किसी एक प्रखंड में जाकर औपचारिक जांच कर लेते हैं, कुछ तस्वीरें खिंचवाते हैं, एक रूटीन रिपोर्ट बना लेते हैं और मामला फिर अगले दिन से पहले जैसा। यह 'औपचारिक सक्रियता’ वास्तव में निष्क्रियता को ढकने का एक तरीका भर है। इससे न मरीजों की सुरक्षा बढ़ती है और न अवैध संस्थानों का आतंक कम होता है।

जिले के लोग पूछ रहे हैं कि जब विभाग दिन-रात "मानक संचालन प्रक्रिया" की बात करता है तो क्या ये मानक सिर्फ कागज़ के लिए हैं? क्या विभाग उस दिन का इंतज़ार कर रहा है जब किसी बड़ी दुर्घटना के बाद उसे जागना पड़े? क्या कानून सिर्फ गरीबों के लिए है और अवैध नर्सिंग होम चलाने वालों के लिए कोई दूसरे नियम?

आज समस्तीपुर को जवाब चाहिए और स्पष्ट जवाब चाहिए। अवैध नर्सिंग होम पर कार्रवाई सिर्फ दिखावा नहीं, बल्कि जनता की सुरक्षा का पहला कदम है। स्वास्थ्य विभाग को यह समझना होगा कि कार्रवाई से बचना भी अनैतिकता का ही एक रूप है।यह सवाल जिले की जनता का है, मीडिया का है, और व्यवस्था की विश्वसनीयता का भी।

अंतिम प्रश्न वही है जो हर व्यक्ति पूछ रहा है—
“समस्तीपुर में अवैध नर्सिंग होम पर सख़्त रोक आखिर कब लगेगी?”

जब तक इसका जवाब नहीं मिलेगा, तब तक यह सवाल जिले की हवा में तैरता रहेगा—और हर जिम्मेदार पदाधिकारी की कुर्सी पर दस्तक देता रहेगा।

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