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रोसड़ा में सुबह चला बुलडोज़र, शाम को वापस कब्ज़ा—क्यों हिम्मत नहीं टूटती अतिक्रमणकारियों की?

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समस्तीपुर/रोसड़ा। रोसड़ा शहर अतिक्रमण की ऐसी गिरफ्त में जकड़ा है कि सुबह प्रशासन का बुलडोज़र चलता है और शाम होते ही कब्जाधारी फिर उसी जगह लौट आते हैं। सवाल सीधा उठता है—रोसड़ा को जाम देने वाले आखिर इतना बेखौफ क्यों हैं? और प्रशासन की कार्रवाई सिर्फ “औपचारिकता” क्यों बनकर रह जाती है?
शहर के मुख्य चौक-चौराहों से लेकर थाना परिसर के आसपास तक अतिक्रमण का ऐसा विस्तार है जो रोसड़ा को प्रतिदिन दमघोंटू जाम में धकेल देता है। सुबह जब प्रशासन ने अभियान चलाया, सड़कों का चेहरा साफ दिखा, लेकिन शाम पड़ते-पड़ते “पहले जैसा” दृश्य लौट आया—दुकानें फिर सड़क पर, ठेले फिर बीच रास्ते, पैदल चलने तक की जगह गायब।अगर कार्रवाई के बाद कब्ज़ाधारी घंटों के भीतर लौट आते हैं, तो इसका मतलब साफ है—या तो डर खत्म हो चुका है या कार्रवाई अधूरी है। दोनों ही स्थिति रोसड़ा के लिए खतरनाक हैं। शहर के लोग वर्षों से जाम के बोझ में पिस रहे हैं—स्कूल बसें फंसती हैं, मरीज अस्पताल नहीं पहुंच पाते, ऑफिस जाने वाले रोज़ संघर्ष करते हैं।
रोसड़ा की सच्चाई यह है कि यहां अतिक्रमण सिर्फ समस्या नहीं, प्रशासन की चुनौती भी है। कार्रवाई एक दिन की नहीं, लगातार और कड़ाई से चलने वाली होनी चाहिए। सिर्फ बुलडोज़र चलाना ही समाधान नहीं—दुबारा कब्ज़ा न हो, इसके लिए निगरानी, बैरिकेडिंग, पुलिस पेट्रोलिंग और सख्त दंडात्मक कदम जरूरी हैं।शहर का आम आदमी अब सवाल पूछ रहा है—“सुबह हटता है, शाम को बसता है… आखिर कब तक?”रोसड़ा को जाम से मुक्त करना है तो प्रशासन को कागज़ी अभियान से आगे बढ़कर सख्त, स्थायी और भय पैदा करने वाली कार्रवाई करनी होगी। वरना बुलडोज़र चले या न चले, कब्ज़ा और जाम—दोनों अपनी जगह मजबूती से कायम रहेंगे।

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