अमरदीप नारायण प्रसाद
पूसा/समस्तीपुर।
राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय (RPCAU) पूसा एक नए विवाद के केंद्र में है। 6 दिसंबर 2025 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के शताब्दी वर्ष के अवसर पर आयोजित होने वाली संगोष्ठी—“RSS@100: एक विचार यात्रा”—ने विश्वविद्यालय की तटस्थता, स्वायत्तता और वैधानिक मानकों पर कई गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। यह कार्यक्रम विश्वविद्यालय के विद्यापति सभागार में होना है, और विश्वविद्यालय की कुलपति डॉ. पुण्यव्रत सुमिलेंदु पांडेय को इसमें विशिष्ट अतिथि के रूप में बुलाया गया है।
निमंत्रण पत्र वायरल—शुरू हुई बहस
कार्यक्रम का आमंत्रण पत्र सामने आते ही सोशल मीडिया और शैक्षणिक समुदाय में यह चर्चा शुरू हो गई कि क्या किसी केंद्रीय विश्वविद्यालय की कुलपति किसी विशिष्ट विचारधारा से जुड़े संगठन के कार्यक्रम में सम्मिलित हो सकती हैं? और उससे भी बड़ा सवाल—क्या विश्वविद्यालय परिसर का इस्तेमाल ऐसे आयोजनों के लिए किया जा सकता है?
विश्वविद्यालय की निष्पक्षता पर सवाल
UGC Regulations 2018 राजनीतिक, सांप्रदायिक या विचारधारात्मक गतिविधियों को विश्वविद्यालय परिसरों में प्रतिबंधित करते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि कुलपति जैसे शीर्ष पद पर बैठे व्यक्ति का इस तरह के कार्यक्रम में भाग लेना विश्वविद्यालय की तटस्थ और वैज्ञानिक छवि को कमजोर कर सकता है।
कानूनी विशेषज्ञों का मत है कि किसी सार्वजनिक विश्वविद्यालय प्रमुख का विचारधारा-आधारित संगठन के मंच पर जाना ‘‘Political Alignment’’ की श्रेणी में आता है, जो प्रशासनिक नैतिकता के खिलाफ माना जाता है।
परिसर उपलब्ध कराने पर भी उठे सवाल
छात्रों और शोधार्थियों का कहना है कि विश्वविद्यालय की इमारतें अकादमिक व शोध-संबंधी कार्यों के लिए बनी हैं। “यदि परिसर किसी खास वैचारिक संगठन को दिया गया, तो अन्य संगठनों को भी इसी अधिकार की मांग करने का रास्ता खुल जाएगा। फिर विवाद का अंत नहीं होगा,” एक शोधार्थी ने कहा।
पूर्व शिक्षकों की चिंता—वैज्ञानिक चरित्र को आघात
कुछ पूर्व शिक्षकों ने भी विश्वविद्यालय के इस निर्णय पर असहमति जताई। उनका कहना है कि एक केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय का यह कदम संस्थान की धर्मनिरपेक्ष और वैज्ञानिक पहचान को नुकसान पहुंचा सकता है।
उनके अनुसार, प्रशासन को किसी भी राजनीतिक या वैचारिक संगठन से दूरी बनाए रखना अनिवार्य है।
कार्रवाई की माँग, कुलाधिपति को शिकायत की तैयारी
मामला बढ़ता देख कुछ नागरिकों ने इस मुद्दे को विश्वविद्यालय के कुलाधिपति तक ले जाने की बात कही है। उनका तर्क है कि यदि विवि प्रमुख ही निष्पक्षता का पालन नहीं करेंगे, तो संस्थान की स्वायत्तता स्वयं प्रश्नों के घेरे में आ जाएगी।
देशभर में केंद्रीय विश्वविद्यालयों में राजनीतिक/विचारधारात्मक कार्यक्रमों को लेकर वर्षों से विवाद होते रहे हैं। RPCAU, पूसा का यह मामला एक बार फिर यह बहस तेज कर देता है कि—
क्या हमारे उच्च शिक्षण संस्थान वैज्ञानिक, तटस्थ और लोकतांत्रिक मर्यादाओं के अनुरूप खुद को बनाए रख पाएंगे?