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Business News: निवेश के 7 आसान नियम, जानिए कैसे बचत से बना सकते हैं मजबूत फाइनेंशियल प्लान

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Alam Ki Khabar | Business News | निवेश शुरू करने से पहले इमरजेंसी फंड, बचत, जोखिम और लंबी अवधि की योजना समझना जरूरी है। जानिए निवेश के 7 आसान नियम और उनका सही इस्तेमाल।

बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली, 15 अगस्त। हर व्यक्ति चाहता है कि उसकी मेहनत की कमाई समय के साथ बढ़े और भविष्य की जरूरतों के लिए पर्याप्त पैसा तैयार हो। कोई अपने बच्चे की पढ़ाई के लिए निवेश करता है तो कोई घर, रिटायरमेंट या आर्थिक सुरक्षा के लिए। लेकिन निवेश की शुरुआत करते समय सबसे बड़ी परेशानी यही होती है कि आखिर कितनी रकम बचाई जाए, कहां निवेश किया जाए और कितना जोखिम लिया जाए।

कई लोगों को कोई SIP शुरू करने की सलाह देता है तो कोई शेयर बाजार, सोना या दूसरी योजनाओं को बेहतर बताता है। अलग-अलग सलाह के बीच नए निवेशक अक्सर बिना पूरी योजना के पैसा लगाना शुरू कर देते हैं। यही वजह है कि निवेश से पहले कुछ बुनियादी नियमों को समझना बेहद उपयोगी हो सकता है।

वित्तीय विशेषज्ञ कुशाग्र मोहन, फाइनेंशियल एक्सपर्ट और निक्सेपा कैपिटल के को-फाउंडर के अनुसार, निवेश को समझने के लिए कुछ आसान ‘रूल ऑफ थंब’ इस्तेमाल किए जा सकते हैं। हालांकि, इन्हें किसी व्यक्ति के लिए तय वित्तीय सलाह नहीं माना जाना चाहिए। आय, उम्र, खर्च, लक्ष्य और जोखिम उठाने की क्षमता के अनुसार रणनीति बदल सकती है।

सबसे पहले समझिए- निवेश का कोई एक फॉर्मूला नहीं

निवेश की दुनिया में ऐसा कोई नियम नहीं है जो हर व्यक्ति पर बिल्कुल उसी तरह लागू हो। जिसकी आमदनी अधिक है, उसकी निवेश क्षमता अलग होगी। वहीं सीमित आय वाले व्यक्ति के लिए पहले रोजमर्रा के खर्च और आपातकालीन जरूरतों को सुरक्षित करना ज्यादा जरूरी हो सकता है।

इसी तरह युवा निवेशक लंबी अवधि के कारण कुछ अधिक जोखिम लेने की क्षमता रख सकता है, जबकि रिटायरमेंट के करीब पहुंच चुके व्यक्ति के लिए पूंजी की सुरक्षा ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकती है।

इसलिए इन नियमों का उद्देश्य निवेशक को एक शुरुआती दिशा देना है, न कि किसी खास शेयर, म्यूचुअल फंड या निवेश योजना में पैसा लगाने का आदेश देना।

1. Rule of 72: पैसा कब हो सकता है दोगुना?

निवेश की संभावित वृद्धि को समझने के लिए Rule of 72 सबसे चर्चित आसान फॉर्मूलों में से एक है।

इसमें 72 को अनुमानित सालाना रिटर्न से भाग दिया जाता है। प्राप्त संख्या बताती है कि उस दर पर पैसा लगभग कितने वर्षों में दोगुना हो सकता है।

उदाहरण के लिए यदि किसी निवेश पर औसतन 12 प्रतिशत सालाना रिटर्न मिलता है तो:

72 ÷ 12 = 6 वर्ष

यानी गणितीय अनुमान के अनुसार पैसा करीब छह साल में दोगुना हो सकता है।

यदि 50,000 रुपये लगाए गए हों तो इस अनुमान के आधार पर करीब छह साल बाद यह रकम लगभग 1 लाख रुपये हो सकती है।

लेकिन यहां सबसे जरूरी बात यह है कि यह अनुमान है, गारंटी नहीं। बाजार आधारित निवेश में हर साल समान रिटर्न नहीं मिलता। टैक्स, महंगाई और वास्तविक निवेश प्रदर्शन का असर भी अंतिम रकम पर पड़ सकता है।

2. Rule of 114: निवेश को तीन गुना करने का अनुमान

अगर लक्ष्य निवेश को लगभग तीन गुना करने का है तो Rule of 114 का इस्तेमाल किया जाता है।

इसमें 114 को अनुमानित सालाना रिटर्न से भाग दिया जाता है।

12 प्रतिशत रिटर्न के उदाहरण में:

114 ÷ 12 = 9.5 वर्ष

यानी 50,000 रुपये के निवेश के तीन गुना होकर करीब 1.5 लाख रुपये बनने में लगभग 9.5 साल लगने का अनुमान लगाया जा सकता है।

यह भी Rule of 72 की तरह केवल गणितीय अनुमान है। वास्तविक बाजार रिटर्न इससे अलग हो सकता है।

3. Rule of 144: पैसा चार गुना करने की गणना

चार गुना निवेश का अनुमान लगाने के लिए Rule of 144 का इस्तेमाल किया जाता है।

यदि संभावित सालाना रिटर्न 12 प्रतिशत माना जाए तो:

144 ÷ 12 = 12 वर्ष

इस हिसाब से 50,000 रुपये लगभग 12 साल में चार गुना होकर करीब 2 लाख रुपये हो सकते हैं।

लेकिन यहां भी निवेशक को केवल फॉर्मूले के आधार पर निर्णय नहीं लेना चाहिए। बाजार में रिटर्न निश्चित नहीं होता और वास्तविक परिणाम निवेश के प्रकार तथा उसकी अवधि पर निर्भर करेगा।

4. 50-30-20 Rule: कमाई को तीन हिस्सों में बांटने का तरीका

निवेश शुरू करने से पहले यह समझना जरूरी है कि हर महीने कमाई में से कितना पैसा खर्च हो रहा है और कितना बच रहा है।

50-30-20 Rule एक लोकप्रिय बजटिंग तरीका है। इसके अनुसार आय को मोटे तौर पर तीन हिस्सों में बांटा जाता है।

50 प्रतिशत जरूरी खर्चों के लिए।

30 प्रतिशत इच्छाओं और लाइफस्टाइल से जुड़े खर्चों के लिए।

20 प्रतिशत बचत और निवेश के लिए।

मान लीजिए मासिक आय 50,000 रुपये है। तब इस मॉडल के अनुसार:

25,000 रुपये जरूरी खर्च

15,000 रुपये अन्य या लाइफस्टाइल खर्च

10,000 रुपये बचत और निवेश

हालांकि, इसे हर व्यक्ति पर हूबहू लागू करना जरूरी नहीं है। किराया, परिवार की जिम्मेदारी, कर्ज और शहर के खर्च के अनुसार अनुपात बदला जा सकता है।

5. Minimum 10% Investment Rule: छोटी शुरुआत भी महत्वपूर्ण

निवेश शुरू करने के लिए हमेशा बड़ी रकम जरूरी नहीं होती। एक आसान नियम के तौर पर अपनी आय का कम से कम 10 प्रतिशत नियमित रूप से बचाने और निवेश करने की कोशिश की जा सकती है।

यदि किसी व्यक्ति की मासिक आय 40,000 रुपये है तो वह शुरुआत में करीब 4,000 रुपये नियमित निवेश के लिए अलग कर सकता है।

इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि व्यक्ति में नियमित निवेश की आदत विकसित होती है। समय के साथ आय बढ़ने पर निवेश की रकम भी बढ़ाई जा सकती है।

निवेश में निरंतरता कई बार शुरुआती बड़ी रकम से ज्यादा महत्वपूर्ण साबित हो सकती है, खासकर लंबी अवधि के लक्ष्यों के लिए।

6. 100 Minus Age Rule: उम्र बढ़ने के साथ जोखिम पर नजर

निवेश में कितना जोखिम लिया जाए, यह हर व्यक्ति के लिए अलग सवाल है। एक लोकप्रिय शुरुआती फॉर्मूला 100 Minus Age Rule है।

इसमें 100 में से अपनी उम्र घटाई जाती है और प्राप्त प्रतिशत को इक्विटी में रखने का एक सामान्य संकेतक माना जाता है।

उदाहरण:

यदि उम्र 30 वर्ष है:

100 - 30 = 70

यानी इस नियम के अनुसार कुल निवेश का करीब 70 प्रतिशत इक्विटी जैसे अपेक्षाकृत जोखिम वाले विकल्पों में और शेष हिस्सा अपेक्षाकृत सुरक्षित विकल्पों में रखने का एक शुरुआती मॉडल बनाया जा सकता है।

लेकिन यह कोई सार्वभौमिक नियम नहीं है। व्यक्ति की आय, लक्ष्य, कर्ज, परिवार की जिम्मेदारियां और बाजार में उतार-चढ़ाव सहने की क्षमता को भी ध्यान में रखना चाहिए।

7. Emergency Fund Rule: निवेश से पहले सुरक्षा कवच

निवेश की योजना बनाते समय लोग अक्सर रिटर्न पर ध्यान देते हैं, लेकिन अचानक आने वाले खर्च को नजरअंदाज कर देते हैं।

नौकरी जाने, बीमारी, परिवार में अचानक खर्च या किसी अन्य आपात स्थिति में अगर तुरंत पैसे की जरूरत पड़ जाए तो निवेश को नुकसान में बेचने या कर्ज लेने की नौबत आ सकती है।

इसीलिए आम तौर पर तीन से छह महीने के जरूरी खर्च के बराबर रकम अलग इमरजेंसी फंड में रखने की सलाह दी जाती है।

यदि किसी व्यक्ति का मासिक जरूरी खर्च 10,000 रुपये है तो 30,000 से 60,000 रुपये तक का आपातकालीन फंड एक शुरुआती लक्ष्य हो सकता है।

इमरजेंसी फंड का उद्देश्य ज्यादा रिटर्न कमाना नहीं, बल्कि जरूरत के समय वित्तीय सुरक्षा उपलब्ध कराना है।

महीने की शुरुआत में पैसा आता है और आखिर में गायब क्यों हो जाता है?

कई परिवारों की आर्थिक परेशानी बड़ी खरीदारी के कारण नहीं बल्कि छोटे-छोटे अनियोजित खर्चों से बढ़ती है। महीने की शुरुआत में वेतन आते ही लगता है कि इस बार बचत जरूर होगी, लेकिन महीने के अंत तक खाते में बहुत कम रकम बचती है।

इस समस्या का एक कारण यह भी है कि लोग पहले खर्च करते हैं और फिर बची रकम को बचाने की कोशिश करते हैं।

इसके बजाय एक बेहतर तरीका यह हो सकता है कि आय मिलते ही बचत और निवेश की रकम अलग कर दी जाए, उसके बाद बाकी पैसे से महीने का खर्च चलाया जाए।

इसे कई लोग ‘Pay Yourself First’ की रणनीति के रूप में अपनाते हैं।

नए निवेशक इन गलतियों से बचें

निवेश की शुरुआत करने वालों को कुछ आम गलतियों से सावधान रहना चाहिए।

सिर्फ दूसरों की सलाह पर निवेश करना जोखिम बढ़ा सकता है। किसी दोस्त या सोशल मीडिया की सलाह देखकर बिना जानकारी पैसा लगाना सही रणनीति नहीं है।

सारा पैसा एक ही जगह लगाना भी जोखिम बढ़ाता है। अलग-अलग परिसंपत्ति वर्गों में संतुलन व्यक्ति की स्थिति के अनुसार बनाया जा सकता है।

आपातकालीन फंड के बिना निवेश शुरू करना मुश्किल समय में निवेश तोड़ने की मजबूरी पैदा कर सकता है।

जल्दी अमीर बनने की कोशिश निवेशक को अनावश्यक जोखिम लेने के लिए प्रेरित कर सकती है।

इसके अलावा बाजार में गिरावट आने पर घबराकर हर निवेश बेच देना भी लंबी अवधि के लक्ष्य को प्रभावित कर सकता है।

निवेश के नियमों को कैसे अपनाएं?

इन सभी नियमों को एक साथ लागू करना जरूरी नहीं है। सबसे पहले अपनी आर्थिक स्थिति को समझना चाहिए।

कितनी आय आती है, जरूरी खर्च कितना है, कोई कर्ज है या नहीं, परिवार की जिम्मेदारियां क्या हैं, भविष्य का लक्ष्य क्या है और कितना जोखिम सहन किया जा सकता है—इन सवालों के जवाब के बाद निवेश की योजना बनाना ज्यादा बेहतर हो सकता है।

सबसे पहले पर्याप्त इमरजेंसी फंड बनाने पर ध्यान दिया जा सकता है। इसके बाद नियमित बचत और निवेश की आदत विकसित की जा सकती है।

समय के साथ आय बढ़े तो निवेश की रकम बढ़ाने पर भी विचार किया जा सकता है। अपनी वित्तीय योजना की समय-समय पर समीक्षा करना भी जरूरी है।

असली मंत्र है अनुशासन

निवेश में केवल यह जानना पर्याप्त नहीं कि पैसा कितने साल में दोगुना हो सकता है। असली चुनौती लगातार निवेश करते रहना, जोखिम को समझना और अपनी क्षमता से अधिक दांव नहीं लगाना है।

Rule of 72, 114 और 144 जैसे फॉर्मूले गणितीय अनुमान समझने में मदद करते हैं। 50-30-20 और 10 प्रतिशत वाले नियम बजट तथा बचत की आदत बनाने में उपयोगी हो सकते हैं। वहीं 100 Minus Age Rule और Emergency Fund Rule जोखिम तथा आर्थिक सुरक्षा की योजना बनाने में शुरुआती दिशा दे सकते हैं।

अंततः हर निवेशक की परिस्थितियां अलग होती हैं। इसलिए किसी भी निवेश निर्णय से पहले अपनी जरूरत, लक्ष्य, जोखिम क्षमता और निवेश की अवधि को ध्यान में रखना सबसे जरूरी है।

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संपादकीय टिप्पणी: निवेश में तेजी नहीं, अनुशासन जरूरी

पैसा बढ़ाने की इच्छा स्वाभाविक है, लेकिन निवेश को जल्द अमीर बनने का रास्ता समझना खतरनाक हो सकता है। बाजार में कभी तेजी आती है तो कभी बड़ी गिरावट। ऐसे समय में सबसे ज्यादा जरूरी है कि निवेशक अपने फैसले भावनाओं के आधार पर न लें।

निवेश के नियम किसी व्यक्ति को दिशा दे सकते हैं, लेकिन उन्हें पत्थर की लकीर नहीं समझना चाहिए। 30 साल के दो लोगों की आर्थिक स्थिति एक जैसी नहीं हो सकती। किसी पर परिवार की बड़ी जिम्मेदारी हो सकती है तो किसी के पास पर्याप्त बचत और कम खर्च हो सकता है।

इसलिए निवेश की पहली सीढ़ी अपनी आर्थिक स्थिति को समझना है। इसके बाद आपातकालीन फंड, नियमित बचत और लंबी अवधि के लक्ष्य पर ध्यान देना चाहिए।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि निवेश का फैसला केवल पिछले रिटर्न देखकर नहीं होना चाहिए। जोखिम भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना संभावित मुनाफा। बाजार में टिके रहने के लिए धैर्य, अनुशासन और समय-समय पर समीक्षा जरूरी है।

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