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Lifestyle News: डॉक्टर-इंजीनियर नहीं, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर बनना चाहते हैं बच्चे, सर्वे में सामने आया बड़ा बदलाव

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Alam Ki Khabar | Lifestyle News | Career News | सोशल मीडिया और शॉर्ट वीडियो प्लेटफॉर्म का बच्चों की करियर पसंद पर बढ़ता प्रभाव, जानिए क्यों इन्फ्लुएंसर बनना नई पीढ़ी के लिए आकर्षण बन रहा है।

डेस्क, नई दिल्ली, 16 अगस्त। कभी बच्चों से पूछा जाता था कि बड़े होकर क्या बनना है तो डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, शिक्षक, पायलट या सेना में जाने जैसे जवाब सबसे आम होते थे। लेकिन स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के दौर में बच्चों के सपनों की दिशा तेजी से बदलती दिखाई दे रही है। अब बड़ी संख्या में बच्चे पारंपरिक पेशों के बजाय कंटेंट क्रिएटर, यूट्यूबर और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर बनने की इच्छा जाहिर कर रहे हैं।

अमेरिका और नॉर्वे में किए गए अध्ययनों में बच्चों की बदलती करियर पसंद को लेकर चौंकाने वाले संकेत सामने आए हैं। रिपोर्टों के मुताबिक, मिडिल और हाई स्कूल स्तर के 60 प्रतिशत से अधिक बच्चों ने सोशल मीडिया से जुड़े पेशों को आकर्षक करियर विकल्प माना। इस बदलाव का असर कम उम्र के बच्चों में भी दिखाई देने लगा है।

कैमरे के सामने दिखता है अब करियर

नई पीढ़ी के बच्चों का सोशल मीडिया से जुड़ाव सिर्फ मनोरंजन तक सीमित नहीं रह गया है। वीडियो बनाने वाले क्रिएटर्स की लोकप्रियता, उनके फॉलोअर्स, ब्रांड प्रमोशन और ऑनलाइन कमाई की चर्चाएं बच्चों को प्रभावित कर रही हैं।

कई बच्चे अपने पसंदीदा क्रिएटर को देखकर यह मानने लगते हैं कि कैमरे के सामने वीडियो बनाना भी एक सफल और आकर्षक करियर हो सकता है। सोशल मीडिया पर लगातार दिखाई देने वाली सफलता की कहानियां इस सोच को और मजबूत करती हैं।

इसमें शॉर्ट वीडियो का भी बड़ा योगदान है। कुछ सेकंड या कुछ मिनट के वीडियो में लोकप्रियता हासिल करने वाले क्रिएटर्स बच्चों के लिए नए दौर के रोल मॉडल बन रहे हैं।

सात साल तक के बच्चों पर भी असर

सोशल मीडिया से प्रभावित होने की उम्र भी कम होती जा रही है। शोध से जुड़े निष्कर्षों में सात साल तक की उम्र के बच्चों में भी डिजिटल क्रिएटर बनने की इच्छा सामने आने की बात कही गई है।

कम उम्र में बच्चे जिस तरह के कंटेंट को लगातार देखते हैं, उसका असर उनके सपनों और भविष्य की कल्पना पर पड़ सकता है। अगर किसी बच्चे के सामने रोजाना लोकप्रिय इन्फ्लुएंसर की जिंदगी, महंगे सामान, यात्रा और बड़ी फैन फॉलोइंग दिखाई देती है तो वह इसे सफलता का आसान रास्ता समझ सकता है।

हालांकि सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली तस्वीर पूरी वास्तविकता नहीं होती। कैमरे के पीछे कंटेंट तैयार करने में समय, मेहनत, तकनीकी कौशल, लगातार काम और मानसिक दबाव भी शामिल होता है।

कुछ साल पहले तस्वीर बिल्कुल अलग थी

कुछ वर्ष पहले किए गए अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में बच्चों की पहली पसंद पारंपरिक पेशे हुआ करते थे। डॉक्टर, वैज्ञानिक, इंजीनियर और शिक्षक जैसे करियर बच्चों के सपनों में प्रमुख स्थान रखते थे।

डिजिटल क्रांति के साथ स्थिति बदलने लगी। इंटरनेट की पहुंच बढ़ी, स्मार्टफोन आम हुआ और वीडियो प्लेटफॉर्म ने हर व्यक्ति को अपना कंटेंट दुनिया तक पहुंचाने का मौका दिया। इसका असर बच्चों की सोच पर भी पड़ा।

आज कोई बच्चा अपने घर से ही वीडियो बनाकर दुनिया के सामने पहुंच सकता है। यही आसान पहुंच इस करियर को बच्चों के लिए खास आकर्षण बना रही है।

भारत में भी बढ़ रहा है प्रभाव

सोशल मीडिया का असर भारत में भी तेजी से दिखाई दे रहा है। उपलब्ध सर्वेक्षणों के अनुसार, देश में जेनरेशन अल्फा के एक बड़े हिस्से ने सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर को भविष्य के करियर विकल्प के रूप में देखा है।

भारत में कम उम्र के डिजिटल क्रिएटर्स की संख्या बढ़ने की बात भी सामने आती रही है। शॉर्ट वीडियो, वीडियो ब्लॉगिंग, गेमिंग और मनोरंजन से जुड़े कंटेंट ने बच्चों और किशोरों के बीच बड़ी जगह बनाई है।

स्मार्टफोन की आसान उपलब्धता ने इस बदलाव को और तेज किया है। अब बच्चे केवल टीवी कलाकारों या खेल सितारों को ही नहीं देखते, बल्कि अपने फोन की स्क्रीन पर ऐसे क्रिएटर्स को भी फॉलो करते हैं जिनसे वे रोजाना जुड़ाव महसूस करते हैं।

क्या इन्फ्लुएंसर बनना गलत करियर है?

ऐसा बिल्कुल नहीं है। डिजिटल कंटेंट क्रिएशन आज वास्तविक रोजगार और व्यवसाय का क्षेत्र बन चुका है। वीडियो एडिटिंग, स्क्रिप्ट राइटिंग, फोटोग्राफी, डिजिटल मार्केटिंग, एंकरिंग और सोशल मीडिया मैनेजमेंट जैसे कई नए काम भी इसी क्षेत्र से जुड़े हैं।

समस्या तब पैदा होती है जब बच्चा सोशल मीडिया की चमक देखकर यह मान ले कि बिना मेहनत के आसानी से पैसा और प्रसिद्धि हासिल की जा सकती है।

हर सफल क्रिएटर के पीछे लंबे समय की मेहनत होती है। कई लोग वर्षों तक लगातार काम करने के बावजूद बड़ी पहचान नहीं बना पाते। इसलिए बच्चों को सोशल मीडिया की सफलता का केवल चमकदार हिस्सा दिखाने के बजाय उसकी पूरी तस्वीर समझाना जरूरी है।

माता-पिता की भूमिका सबसे अहम

बच्चों के करियर को लेकर माता-पिता का नजरिया भी बदलना जरूरी है। बच्चे अगर सोशल मीडिया से प्रभावित होकर कंटेंट क्रिएशन में रुचि दिखाते हैं तो उन्हें तुरंत रोकने के बजाय यह समझने की कोशिश करनी चाहिए कि उनकी वास्तविक दिलचस्पी किस क्षेत्र में है।

अगर बच्चे को कैमरे के सामने बोलना पसंद है तो उसके साथ पत्रकारिता, संचार, अभिनय और मीडिया जैसे विकल्पों पर भी चर्चा की जा सकती है। वीडियो बनाने में रुचि है तो फिल्म निर्माण, एडिटिंग, डिजाइन और डिजिटल मीडिया के क्षेत्र भी सामने रखे जा सकते हैं।

इस तरह सोशल मीडिया की रुचि को एक व्यापक करियर दिशा में बदला जा सकता है।

स्कूलों में भी करियर जागरूकता की जरूरत

स्कूलों की भूमिका भी इस बदलाव में महत्वपूर्ण हो जाती है। बच्चों को सिर्फ डॉक्टर, इंजीनियर और सरकारी नौकरी जैसे पारंपरिक विकल्प बताने के बजाय डिजिटल अर्थव्यवस्था से जुड़े नए करियर के बारे में भी जानकारी दी जानी चाहिए।

साथ ही उन्हें यह समझाना जरूरी है कि किसी भी पेशे में सफलता के लिए शिक्षा, कौशल, अनुशासन और लगातार मेहनत आवश्यक है।

करियर का चुनाव केवल इसलिए नहीं होना चाहिए कि कोई व्यक्ति इंटरनेट पर प्रसिद्ध है। बच्चे को अपनी रुचि, क्षमता, स्वभाव और भविष्य की संभावनाओं को समझकर फैसला लेना चाहिए।

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बच्चों के सपनों को रोकें नहीं, सही दिशा जरूर दें

बच्चों का सोशल मीडिया की तरफ आकर्षित होना आज के डिजिटल दौर की स्वाभाविक प्रक्रिया है। इंटरनेट ने उन्हें दुनिया देखने और अपनी प्रतिभा दिखाने का नया मंच दिया है। इसलिए बच्चों को डिजिटल दुनिया से पूरी तरह दूर करना व्यावहारिक समाधान नहीं है।

जरूरत इस बात की है कि बच्चे सोशल मीडिया की लोकप्रियता और वास्तविक करियर के बीच अंतर समझें। किसी इन्फ्लुएंसर की चमकदार जिंदगी देखकर उसके पीछे की मेहनत, असफलता और अनिश्चितता को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

माता-पिता बच्चों की रुचि को दबाने के बजाय उसे सही दिशा दे सकते हैं। अगर बच्चा वीडियो बनाना चाहता है तो उसे भाषा, कहानी कहने, तकनीक और रचनात्मकता सीखने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। इससे सोशल मीडिया का इस्तेमाल केवल मनोरंजन के बजाय कौशल विकास का माध्यम बन सकता है।

आखिरकार करियर का सबसे अच्छा विकल्प वही है जिसमें बच्चे की रुचि और क्षमता दोनों का संतुलन हो। डॉक्टर या वैज्ञानिक बनना ही सफलता का एकमात्र रास्ता नहीं है और इन्फ्लुएंसर बनना भी आसान सफलता की गारंटी नहीं। बच्चों को विकल्पों की पूरी दुनिया दिखाना और सही निर्णय लेने की क्षमता विकसित करना ही सबसे बेहतर रास्ता है।

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