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Lifestyle News: ‘भाभी खोलो तिजोरी का ताला’ में छिपी ननद-भाभी की नोकझोंक, जानिए सोहर गीत की दिलचस्प परंपरा

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Alam Ki Khabar | Bihar News | Patna News | Samastipur News | ‘भाभी खोलो तिजोरी का ताला’ जैसे सोहर गीतों में बच्चे के जन्म की खुशी, ननद-भाभी की हंसी-ठिठोली और नेग की पारंपरिक रस्म की झलक मिलती है।

डेस्क, 18 अगस्त। आलम की खबर: “भाभी खोलो तिजोरी का ताला, आज जन्मा भतीजा हमारा...” यह पंक्ति सुनते ही किसी ग्रामीण घर में बच्चे के जन्म के बाद होने वाली हंसी-खुशी का दृश्य आंखों के सामने उभर आता है। ढोलक की थाप, महिलाओं का सामूहिक गायन, बधाइयों की आवाज और रिश्तेदारों के बीच होने वाली मजेदार नोकझोंक—सोहर गीतों की यही खासियत रही है।

उत्तर भारत के बिहार, उत्तर प्रदेश और आसपास के हिंदी भाषी इलाकों में बच्चे के जन्म से जुड़े सोहर लोकगीत लंबे समय से पारिवारिक उत्सवों का हिस्सा रहे हैं। इन गीतों में जहां नवजात के लिए मंगलकामना की जाती है, वहीं परिवार के सदस्यों के बीच रिश्तों और हंसी-मजाक को भी गीत का रूप दिया जाता है।

इसी परंपरा में “भाभी खोलो तिजोरी का ताला” जैसी पंक्तियां खास आकर्षण पैदा करती हैं। पहली नजर में तिजोरी खोलने की बात कुछ अलग लग सकती है, लेकिन लोकपरंपरा के संदर्भ में इसका संबंध बच्चे के जन्म की खुशी में मांगे जाने वाले नेग से है।

तिजोरी का ताला असल में किस बात का संकेत?

लोकगीतों की भाषा अक्सर सीधे-सीधे बात कहने के बजाय उसे मजेदार और चुटीले अंदाज में पेश करती है। बच्चे के जन्म पर ननद अपनी भाभी से नेग मांगती है। लेकिन मांग को सामान्य बातचीत में रखने के बजाय गीत के जरिए मजाकिया तरीके से सामने रखा जाता है।

“तिजोरी का ताला खोलो” इसी नटखट आग्रह का प्रतीक माना जा सकता है। मतलब साफ है—घर में भतीजे का जन्म हुआ है, खुशी का अवसर है और अब ननद को अपना नेग चाहिए।

नेग में पैसे, कपड़े, आभूषण या कोई दूसरी भेंट हो सकती है। गीतों में इसे बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना लोकसंगीत की सामान्य शैली रही है। छोटी-सी मांग भी गीत में ऐसी बन जाती है कि सुनने वाले हंसने लगते हैं।

भतीजे के जन्म पर ननद का क्यों बनता है अधिकार?

सोहर केवल बच्चे के जन्म का गीत नहीं है। यह परिवार के रिश्तों को आवाज देने वाली लोकपरंपरा भी है। इसमें दादा-दादी, माता-पिता, चाचा, ननद, भाभी और दूसरे रिश्तेदारों का जिक्र अलग-अलग रूप में मिलता है।

ननद के लिए भाई के घर बेटे का जन्म विशेष खुशी का अवसर माना जाता है। वह बधाई देने के साथ अपनी भाभी से नेग लेने का अधिकार भी जताती है। इसी वजह से कई सोहर में ननद और भाभी के बीच काल्पनिक संवाद देखने को मिलता है।

भाभी नेग देने में थोड़ी आनाकानी करती है और ननद अपनी मांग पर अड़ी रहती है। दोनों के बीच यह बातचीत असल में झगड़ा नहीं होती, बल्कि रिश्ते में मौजूद अपनापन और अधिकार को दिखाने का लोक तरीका है।

ननद-भाभी के रिश्ते की मिठास

भारतीय पारिवारिक संस्कृति में ननद और भाभी का रिश्ता लंबे समय से हंसी-मजाक और अपनत्व के लिए जाना जाता रहा है। भाभी के घर आने के बाद ननद के रिश्ते में एक नई आत्मीयता जुड़ती है।

लोकगीतों ने इस रिश्ते को किसी औपचारिक भाषा में नहीं, बल्कि रोजमर्रा की चुटीली बातचीत के जरिए सहेजा। सोहर में यह रिश्ता और खुलकर सामने आता है।

ननद कभी कंगन मांगती है, कभी कपड़े या पैसे का नेग, तो कभी मजाक में ऐसी मांग रख देती है जिसे सुनकर पूरा परिवार हंसने लगता है। भाभी भी जवाब देती है और इसी संवाद से गीत का माहौल जीवंत हो जाता है।

सोहर में नेग की रस्म क्यों महत्वपूर्ण है?

बच्चे के जन्म जैसे शुभ अवसरों पर रिश्तेदारों द्वारा उपहार या नेग देने-लेने की परंपरा उत्तर भारत के कई हिस्सों में रही है। यह केवल लेन-देन नहीं बल्कि खुशी में रिश्तेदारों की भागीदारी का प्रतीक रहा है।

लोकगीतों ने इसी परंपरा को मनोरंजन से जोड़ दिया। जब ननद नेग मांगती है तो गीत में उसकी मांग बड़ी बन जाती है। “तिजोरी का ताला” इसी अतिशयोक्तिपूर्ण शैली का उदाहरण है।

इस तरह गीत में तिजोरी किसी वास्तविक मांग की सीमा तय करने के बजाय समृद्धि और खुशी का प्रतीक बन जाती है। संदेश यह रहता है कि घर में नई खुशी आई है, इसलिए आज उदार होकर नेग दीजिए।

सोहर की शुरुआत केवल मनोरंजन से नहीं हुई

सोहर गीतों की परंपरा का मूल उद्देश्य शुभ अवसर पर सामूहिक खुशी व्यक्त करना रहा है। बच्चे के जन्म के बाद महिलाएं एकत्र होकर मंगलगीत गाती थीं। इन गीतों में नवजात के अच्छे भविष्य, माता-पिता की खुशी और परिवार की समृद्धि की कामना की जाती थी।

समय के साथ इसमें परिवार के रिश्तों, सामाजिक व्यवहार और हास्य के प्रसंग भी जुड़ते गए। यही वजह है कि अलग-अलग क्षेत्रों में सोहर के बोल और धुन अलग मिलते हैं, लेकिन भावनात्मक केंद्र अक्सर एक ही रहता है—नए जीवन के आगमन की खुशी।

बदलते समय में भी क्यों कायम है आकर्षण?

आज बच्चे के जन्म का उत्सव पहले की तुलना में काफी बदल चुका है। अस्पताल, सोशल मीडिया, वीडियो और आधुनिक पारिवारिक समारोहों ने पुराने तौर-तरीकों की जगह काफी हद तक ले ली है। फिर भी सोहर जैसे लोकगीत पूरी तरह गायब नहीं हुए हैं।

इन गीतों की खासियत यह है कि इनमें किसी परिवार की निजी खुशी के साथ पूरे समुदाय की भागीदारी दिखाई देती है। ढोलक के साथ महिलाएं जब सामूहिक रूप से सोहर गाती हैं, तो खुशी सिर्फ माता-पिता की नहीं रहती, बल्कि पूरा परिवार उसका हिस्सा बन जाता है।

“भाभी खोलो तिजोरी का ताला” जैसी पंक्तियां इसी सांस्कृतिक स्मृति को जीवित रखती हैं। इसमें हास्य है, नेग की रस्म है, ननद-भाभी की नोकझोंक है और सबसे बढ़कर परिवार में आए नए सदस्य की खुशी है।

लोकगीत में छिपा है रिश्तों का पूरा संसार

इस तरह देखा जाए तो “भाभी खोलो तिजोरी का ताला” केवल नेग मांगने वाला गीत नहीं है। यह उस पारिवारिक संस्कृति का हिस्सा है, जिसमें रिश्तेदार अपनी खुशी को गीत, मजाक और रस्मों के जरिए व्यक्त करते थे।

आज जब पारंपरिक लोकगीतों की जगह आधुनिक संगीत तेजी से ले रहा है, ऐसे गीतों को याद करना लोक संस्कृति को समझने का भी एक जरिया है। सोहर में बच्चे के जन्म की खुशी के साथ उस दौर के सामाजिक रिश्तों और पारिवारिक व्यवहार की तस्वीर भी दिखाई देती है।

यही कारण है कि “भाभी खोलो तिजोरी का ताला, आज जन्मा भतीजा हमारा” जैसी पंक्तियां सुनते ही लोगों को केवल एक गीत याद नहीं आता, बल्कि ननद-भाभी की वह चुलबुली नोकझोंक याद आती है जिसमें अपनापन, अधिकार और खुशी तीनों साथ दिखाई देते हैं।

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लोकगीतों में बची है परिवार की पुरानी तस्वीर

लोकगीतों की सबसे बड़ी ताकत यही है कि वे इतिहास की तरह तारीखें दर्ज नहीं करते, बल्कि समाज की जीवनशैली को शब्द और धुन के जरिए बचाकर रखते हैं। सोहर इसका अच्छा उदाहरण है।

“भाभी खोलो तिजोरी का ताला” जैसी पंक्ति सुनने में भले ही हास्य पैदा करती हो, लेकिन इसके पीछे परिवार के भीतर मौजूद रिश्तों की एक पूरी संरचना दिखाई देती है। ननद का नेग मांगना, भाभी का मजाक में टालना और बाकी महिलाओं का हंसते हुए गीत में शामिल होना—यह सब सामूहिक पारिवारिक संस्कृति का हिस्सा रहा है।

आज ऐसे अवसरों पर मोबाइल कैमरे और सोशल मीडिया मौजूद हैं, लेकिन पहले खुशियों को यादगार बनाने का माध्यम यही गीत थे। इसलिए सोहर को सिर्फ पुराने जमाने का संगीत मानना उचित नहीं होगा। यह लोकसमाज की स्मृति है।

जरूरत इस बात की है कि इन पारंपरिक गीतों को केवल मनोरंजन के रूप में नहीं, बल्कि लोक संस्कृति की धरोहर के रूप में भी देखा जाए। आने वाली पीढ़ियां इन गीतों के जरिए यह समझ सकती हैं कि परिवार, रिश्ते और खुशियां कभी किस तरह सामूहिक रूप से मनाई जाती थीं।

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