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निगरानी की छापेमारी से बेनकाब हुआ घूस का तंत्र, बिहार में भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी

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पटना/राज्य ब्यूरो।बिहार में भ्रष्टाचार अब महज़ आरोपों की सीमा में नहीं रहा, बल्कि हाल के दिनों में निगरानी अन्वेषण ब्यूरो की लगातार छापेमारी ने यह साफ कर दिया है कि सरकारी दफ्तरों में घूस एक सिस्टम बन चुकी है। बेगूसराय, पूर्वी चम्पारण और मुजफ्फरपुर जैसे जिलों में हुई कार्रवाई ने प्रशासनिक व्यवस्था की सच्चाई उजागर कर दी है।

निगरानी की टीम ने अलग-अलग जिलों में पदस्थ अधिकारियों और कर्मचारियों को रिश्वत लेते रंगे हाथ गिरफ्तार किया है। कहीं 18 हजार रुपये के बिल पर 1800 रुपये की मांग की गई, तो कहीं लाभुक से 4 हजार रुपये सीधे वसूले गए। जमीन, कल्याण और सामाजिक योजनाओं से जुड़े मामलों में घूस की मांग सामने आना बताता है कि भ्रष्टाचार अब निचले स्तर तक जड़ जमा चुका है।

हर दफ्तर, एक जैसी कहानी

कार्रवाई में सामने आया कि काम की प्रकृति अलग हो सकती है, लेकिन तरीका एक ही है—पहले पैसा, फिर फाइल आगे बढ़ेगी। गरीबों, लाभुकों और छोटे आपूर्तिकर्ताओं को महीनों चक्कर कटवाने के बाद मजबूरी में रिश्वत देनी पड़ती है।

निगरानी की सक्रियता से मचा हड़कंप

निगरानी विभाग की सख्त कार्रवाई के बाद संबंधित कार्यालयों में अफरा-तफरी का माहौल देखा गया। कई दफ्तरों में कर्मचारी दबी जुबान में स्वीकार कर रहे हैं कि बिना घूस के काम होना मुश्किल हो गया था। छापेमारी ने यह भी संकेत दिया है कि घूसखोरी किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं, बल्कि इसके पीछे संगठित तंत्र काम कर रहा है।

भ्रष्टाचार पर वार, लेकिन सवाल बरकरार

हालांकि निगरानी की कार्रवाई से आम लोगों में राहत की भावना है, लेकिन यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या यह कार्रवाई सिर्फ कुछ मामलों तक सीमित रहेगी या फिर पूरे नेटवर्क की जांच होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक ऊपर से नीचे तक जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक ऐसी कार्रवाई स्थायी समाधान नहीं बन सकती।

जनता की नजरें आगे की कार्रवाई पर

राज्य में लगातार हो रही गिरफ्तारियों ने एक बार फिर प्रशासनिक पारदर्शिता पर बहस छेड़ दी है। जनता की नजर अब इस बात पर टिकी है कि निगरानी की यह मुहिम केवल छापेमारी तक सीमित रहती है या फिर भ्रष्टाचार पर निर्णायक चोट करती है।

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