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बिहार विधानसभा स्थापना दिवस: लोकतंत्र की गरिमा और सशक्त विधायक का संदेश

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पटना।बिहार विधानसभा का स्थापना दिवस शनिवार को एक ऐतिहासिक सियासी और संवैधानिक कार्यक्रम के रूप में आयोजित किया गया। विधानसभा परिसर इस दिन न सिर्फ विधायकों और राजनीतिक शख्सियतों का केंद्र बना, बल्कि लोकतंत्र के महत्व, सदन की गरिमा और भविष्य की दिशा तय करने वाले संदेशों का मंच भी बन गया।
कार्यक्रम का उद्घाटन लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला, विधानसभा अध्यक्ष प्रेम कुमार और अन्य विशिष्ट अतिथियों ने दीप प्रज्ज्वलन कर किया। उद्घाटन के बाद ओम बिड़ला ने “सशक्त विधायक–सशक्त लोकतंत्र” के विषय पर अपने विचार साझा किए। उन्होंने बिहार की ऐतिहासिक और आध्यात्मिक पहचान को रेखांकित करते हुए कहा कि यह धरती हमेशा से नेतृत्व, आंदोलन और विचारों की पैदावार रही है।
लोकसभा अध्यक्ष ने सदस्यों से अपील की कि सदन में शोर-शराबे और हंगामे की राजनीति नहीं होनी चाहिए। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा, “विधायकों का असली सशक्तिकरण तभी संभव है, जब वे संविधान की समझ और जनता की भावना के साथ अपने मुद्दों को उठाएँ।” उन्होंने यह भी बताया कि देश की विधानसभाओं और संसद की कार्यवाही अब एक डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध होगी, जिससे पारदर्शिता बढ़ेगी और जनता विधायकों की क्षमता और उपलब्धियों को आसानी से देख सकेगी।
ओम बिड़ला ने यह भी बताया कि 2026 के अंत तक सभी राज्यों की विधानसभाओं का डिजिटाइजेशन पूरा कर लिया जाएगा। उनका मानना है कि डिजिटल डेटा और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का सही इस्तेमाल विधायकों को जनता के साथ प्रभावी संवाद और नीति निर्माण में मदद करेगा।
विधानसभा अध्यक्ष प्रेम कुमार ने स्वागत भाषण में कहा कि यह समारोह सिर्फ़ उत्सव नहीं बल्कि सदन की मर्यादा, लोकतंत्र की मजबूती और विधायकों की जिम्मेदारी का परिचायक है। उन्होंने सभी विधायकों से आग्रह किया कि जनता के सवालों और सरोकारों को गंभीरता से उठाएँ, क्योंकि लोकतंत्र की ताकत सीधे तौर पर सशक्त और जवाबदेह विधायक पर निर्भर करती है।
इस मौके पर केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरन रिजीजू, राज्यसभा उपसभापति हरिवंश, उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, संसदीय कार्य मंत्री विजय चौधरी, नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव और विधानसभा के उपाध्यक्ष नरेंद्र नारायण यादव समेत बिहार मंत्रिपरिषद और विधानमंडल के सभी सदस्य उपस्थित थे।
कार्यक्रम में डिजिटल लोकतंत्र, पारदर्शिता और विधायकों की जिम्मेदारी पर जोर दिया गया। यह स्थापना दिवस सिर्फ़ परंपरा का पालन नहीं रहा, बल्कि सदन की गरिमा, लोकतंत्र की मजबूती और भविष्य की राजनीति की दिशा तय करने का अवसर भी साबित हुआ। सियासी विशेषज्ञों का मानना है कि इस कार्यक्रम ने विधायकों को आत्ममंथन और लोकतंत्र के सशक्तिकरण का संदेश दिया, जो आने वाले विधानसभा सत्रों में महत्वपूर्ण साबित होगा।

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