पटना।बिहार विधानसभा के स्थापना दिवस पर शनिवार को संयुक्त सदन न केवल औपचारिक समारोह का गवाह बना, बल्कि यह दिन संसदीय मूल्यों, लोकतांत्रिक मर्यादाओं और जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर गहन आत्ममंथन का मंच भी बन गया। देश की संसद और विधानसभाओं के वरिष्ठ नेतृत्व ने इस अवसर पर अपने अनुभव साझा करते हुए बिहार की ऐतिहासिक, बौद्धिक और लोकतांत्रिक विरासत को रेखांकित किया।
केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने अपने संसदीय जीवन के अनुभव साझा करते हुए अंतरराष्ट्रीय तुलना के जरिए भारतीय लोकतंत्र की जटिलताओं को सामने रखा। उन्होंने बताया कि इंग्लैंड के एक संसदीय दौरे के दौरान उन्हें भारत और वहां की संसदीय व्यवस्था के बीच बड़ा फर्क महसूस हुआ। जहां भारत में एक सांसद औसतन 25 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करता है, वहीं इंग्लैंड में यह संख्या करीब 90 हजार तक सीमित है।
किरेन रिजिजू ने कहा कि भारत में सांसदों और विधायकों की भूमिका सिर्फ कानून बनाने तक सीमित नहीं है। यहां जनप्रतिनिधियों को जनता की रोजमर्रा की समस्याओं—जेल से बेल, अस्पताल में भर्ती, स्कूल में नामांकन, नाली-बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं—तक में हस्तक्षेप करना पड़ता है। इसके उलट इंग्लैंड में सांसदों का मुख्य फोकस नीति निर्माण और विधायी बहसों पर होता है।
उन्होंने बिहार को “ज्ञान की धरती” बताते हुए कहा कि भगवान बुद्ध ने यहीं से विश्व को शांति और करुणा का मार्ग दिखाया। उन्होंने कहा कि बिहार से पूरे देश को बहुत कुछ सीखने की जरूरत है। बिहार के लोग बेहतरीन वक्ता होते हैं और जब यहां के जनप्रतिनिधि सदन में बोलते हैं तो बहस जीवंत रहती है। उन्होंने सदस्यों से कहा कि बिहारी होने पर गर्व करना चाहिए।
केंद्रीय मंत्री ने यह भी बताया कि विधानसभा अध्यक्ष के आग्रह पर उन्होंने अपने कार्यक्रम में बदलाव कर बिहार आना जरूरी समझा। उन्होंने बिहार विधान परिषद को देश का पहला “लाइव सदन” बताते हुए तकनीक के इस्तेमाल की सराहना की। साथ ही उन्होंने सदस्यों को नसीहत दी कि सदन में प्रभावी ढंग से अपनी बात रखने के लिए नियमों और प्रक्रियाओं का गहन ज्ञान बेहद जरूरी है।
इस अवसर पर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला ने कहा कि देश का नेतृत्व विधानसभाओं से ही निकलता है। उन्होंने सदन में शोर-शराबे की राजनीति से परहेज करने की बात कहते हुए कहा कि लोकतंत्र में सबसे मजबूत आवाज वही होती है, जो संविधान की समझ और जनता की भावना के सम्मान से उठे। उन्होंने बिहार को आध्यात्मिक और वैचारिक परंपरा की ऐतिहासिक भूमि बताया।
राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश ने भी संसदीय मर्यादाओं पर जोर देते हुए कहा कि लोकतंत्र सिर्फ संस्थाओं से नहीं, बल्कि मूल्यों से मजबूत होता है। उन्होंने कहा कि संसदीय परंपराओं की विरासत को संभालना आज की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। उन्होंने ई-विधान प्रणाली का उल्लेख करते हुए कहा कि तकनीक ने विधायकों को अधिक सक्षम और जवाबदेह बनाया है, जिससे जनता अपने प्रतिनिधियों के कार्यों का आकलन आसानी से कर पा रही है।
कुल मिलाकर, बिहार विधानसभा का स्थापना दिवस सिर्फ एक उत्सव नहीं रहा, बल्कि यह लोकतंत्र की आत्मा, संसदीय गरिमा और नीतिगत राजनीति को मजबूत करने का स्पष्ट संदेश लेकर आया। यह दिन विधायकों के लिए याद दिलाने वाला साबित हुआ कि लोकतंत्र की असली ताकत शोर में नहीं, बल्कि विचार, मर्यादा और जिम्मेदारी में है।