दरभंगा।दरभंगा जिले के विश्वविद्यालय थाना क्षेत्र अंतर्गत पटवा पोखरा के समीप एक आठ वर्षीय बच्ची के साथ हुई दरिंदगी ने पूरे शहर को झकझोर कर रख दिया है। मासूम के साथ दुष्कर्म के बाद उसकी नृशंस हत्या कर दी गई, जिससे इलाके में गहरा आक्रोश और तनाव का माहौल बन गया है। घटना के बाद लोगों का गुस्सा सड़कों पर फूट पड़ा और देर रात तक हालात बेकाबू होते रहे।
जानकारी के अनुसार, बच्ची शाम के समय घर से पास के तालाब किनारे अन्य बच्चों के साथ खेलने निकली थी। देर तक घर नहीं लौटने पर परिजन और स्थानीय लोग उसकी तलाश में जुट गए। काफी खोजबीन के बाद भी जब कोई सुराग नहीं मिला, तो परिजनों की चिंता और बढ़ गई। इसी बीच देर रात इलाके में असामान्य हलचल और कुत्तों के भौंकने की आवाज सुनकर परिजन मौके की ओर पहुंचे, जहां बच्ची का शव खून से सना पड़ा मिला। यह दृश्य देखकर पूरे मोहल्ले में चीख-पुकार मच गई।
घटना की सूचना मिलते ही विश्वविद्यालय थाना पुलिस मौके पर पहुंची और जांच शुरू की। आसपास के क्षेत्र को घेराबंदी कर सुरक्षित किया गया। प्रारंभिक जांच में घटनास्थल के पास दीवारों पर खून के निशान पाए गए, जिससे वारदात की भयावहता का अंदाजा लगाया जा सकता है। पुलिस ने तुरंत फॉरेंसिक टीम को बुलाया, जिसने मौके से साक्ष्य एकत्र किए।
घटना सामने आते ही स्थानीय लोगों का गुस्सा फूट पड़ा। बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर उतर आए और आरोपी को कड़ी से कड़ी सजा, यहां तक कि फांसी देने की मांग करने लगे। देखते ही देखते प्रदर्शन उग्र हो गया। आक्रोशित भीड़ ने सड़क जाम कर दिया और पुलिस पर पथराव की घटनाएं भी सामने आईं। हालात बिगड़ते देख पुलिस को हल्का लाठीचार्ज कर भीड़ को नियंत्रित करना पड़ा। इस दौरान महिलाएं भी बड़ी संख्या में सड़कों पर उतरकर विरोध जताती नजर आईं।
उपद्रव के दौरान आरोपित से जुड़ी एक दुकान और टेम्पो में आग लगा दी गई, जिससे स्थिति और तनावपूर्ण हो गई। मौके पर पुलिस बल के साथ प्रशासनिक अधिकारी तैनात किए गए और अतिरिक्त बल बुलाकर क्षेत्र में सुरक्षा बढ़ाई गई।
इधर, घटना की गंभीरता को देखते हुए वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक जगुनाथ रेड्डी स्वयं देर रात घटनास्थल पर पहुंचे और हालात का जायजा लिया। उनके निर्देश पर बच्ची के शव को पोस्टमार्टम के लिए डीएमसीएच भेजा गया। पुलिस ने आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगालनी शुरू की और साथ खेलने वाले बच्चों से भी पूछताछ की।
पुलिस सूत्रों के अनुसार, बच्चों के बयान और सीसीटीवी फुटेज के आधार पर विकास महतो नामक युवक को हिरासत में लिया गया, बाद में उसे गिरफ्तार कर लिया गया। उसके पास से घटना से जुड़े अहम साक्ष्य भी बरामद किए गए हैं। पुलिस का कहना है कि मामले की वैज्ञानिक और कानूनी हर पहलू से जांच की जा रही है।
घटना के बाद पूरे इलाके में दहशत और आक्रोश का माहौल है। लोग न्याय की मांग को लेकर लगातार प्रशासन पर दबाव बना रहे हैं। प्रशासन ने भरोसा दिलाया है कि आरोपी के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए इलाके में पुलिस बल की तैनाती जारी रहेगी।
संपादकीय दृष्टि / विशेष टिप्पणी
दरभंगा की मासूम और सिस्टम की चुप्पी
दरभंगा की वह आठ साल की बच्ची अब किसी घर की बेटी नहीं रही, वह पूरे समाज का सवाल बन चुकी है। पटवा पोखरा के पास हुई यह हैवानियत केवल एक अपराध नहीं, बल्कि हमारे सामाजिक तंत्र, सुरक्षा व्यवस्था और सामूहिक संवेदनहीनता पर सीधा तमाचा है।
एक बच्ची, जो खेलने निकली थी, उसे क्या पता था कि लौटते वक्त उसे अपनी जिंदगी गंवानी पड़ेगी। यह घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हमारे मोहल्ले, गलियां और सार्वजनिक जगहें अब बच्चों के लिए सुरक्षित नहीं रहीं? सवाल केवल अपराधी का नहीं है, सवाल उस माहौल का भी है, जिसमें ऐसे अपराध बार-बार जन्म ले रहे हैं।
घटना के बाद लोगों का गुस्सा सड़कों पर उतर आया। यह गुस्सा स्वाभाविक है, क्योंकि जब न्याय की रफ्तार पर भरोसा डगमगाने लगता है, तो भीड़ फैसले लेने निकल पड़ती है। लेकिन क्या सड़क जाम, आगजनी और पथराव से मासूम को इंसाफ मिलेगा? या फिर यह सब एक और दर्दनाक घटना को राजनीतिक और प्रशासनिक रस्साकशी में बदल देगा?
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि ऐसे मामलों में हर बार “कड़ी कार्रवाई” और “फास्ट ट्रैक जांच” के आश्वासन दिए जाते हैं, लेकिन कुछ समय बाद मामला फाइलों में दब जाता है। सवाल यह है कि क्या हम हर घटना के बाद केवल आक्रोश जताकर शांत हो जाएंगे, या फिर वास्तव में बच्चों की सुरक्षा को प्राथमिकता बनाएंगे?
यह घटना यह भी बताती है कि अपराध से पहले की रोकथाम हमारी सबसे बड़ी कमजोरी है। मोहल्लों में निगरानी तंत्र, संदिग्ध गतिविधियों पर नजर और बच्चों को सुरक्षित माहौल — ये सब केवल योजनाओं तक सीमित रह जाते हैं।
दरभंगा की इस मासूम की मौत हमें याद दिलाती है कि न्याय केवल सजा से नहीं, बल्कि भरोसे से बनता है। जब तक समाज, प्रशासन और कानून एक साथ खड़े होकर ऐसे अपराधों को जड़ से खत्म करने का संकल्प नहीं लेते, तब तक हर अगली खबर किसी और मासूम की चीख बनकर सामने आती रहेगी।
यह वक्त केवल दोषी को सजा दिलाने का नहीं, बल्कि यह तय करने का है कि अगली बच्ची सुरक्षित घर लौटेगी या नहीं।