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समस्तीपुर के सिंघिया प्रखंड में मौसम का कहर, आंधी-बारिश से तबाह फसल; किसानों पर संकट, सरकार से मुआवजे की आस

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मोहम्मद आलम प्रधान संपादक 

     (Alam ki khabar.com)

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चार महीने की मेहनत पर पानी, गेहूं की फसल बर्बाद; नियम के तहत 7500 से 22500 रुपये प्रति हेक्टेयर तक राहत का प्रावधान, सर्वे के बाद मिलेगा मुआवजा

समस्तीपुर/सिंघिया: बिहार के समस्तीपुर जिले के सिंघिया प्रखंड में इन दिनों मौसम की बेरहम मार ने किसानों की जिंदगी को गहरे संकट में डाल दिया है। चार महीने की कड़ी मेहनत, खेतों में दिन-रात की मशक्कत और बेहतर फसल की उम्मीदें अब तेज आंधी, बारिश और खराब मौसम की वजह से बिखरती नजर आ रही हैं। खेतों में जहां कुछ दिन पहले तक लहलहाती गेहूं की फसल किसानों के चेहरे पर मुस्कान ला रही थी, वहीं अब वही खेत टूटे हुए पौधों, गिरे बालियों और पानी से भरे खेतों के रूप में एक दर्दनाक मंजर पेश कर रहे हैं।

सिंघिया प्रखंड के गांवों में घूमने पर किसानों की आंखों में चिंता, बेबसी और मायूसी साफ दिखाई देती है। जिन खेतों में मेहनत की हर बूंद पसीने के रूप में गिरी थी, वहां अब बर्बादी का सन्नाटा पसरा है। किसानों का कहना है कि यह सिर्फ फसल का नुकसान नहीं है, बल्कि उनके सपनों, उम्मीदों और भविष्य की योजनाओं पर सीधा प्रहार है। कई किसानों ने कर्ज लेकर बीज, खाद और सिंचाई का इंतजाम किया था, लेकिन अब फसल बर्बाद होने से वे कर्ज चुकाने को लेकर भी चिंतित हैं।

एक किसान ने भावुक होकर बताया कि इस बार उन्होंने सोचा था कि गेहूं की अच्छी पैदावार से घर की आर्थिक स्थिति सुधरेगी, बच्चों की पढ़ाई और अन्य जरूरी खर्च पूरे होंगे, लेकिन अब हालात ऐसे हो गए हैं कि घर चलाना भी मुश्किल लग रहा है। खेतों में खड़े होकर अपनी बर्बाद फसल को देखते हुए कई किसान खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं। उनकी मेहनत पर मौसम की एक मार ने पानी फेर दिया है।

तेज हवाओं और लगातार बारिश ने गेहूं की फसल को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है। खेतों में पानी भर जाने से फसल की जड़ें कमजोर हो गईं और तेज हवा के कारण पौधे गिर गए। कई जगहों पर दाने काले पड़ने लगे हैं, जिससे उनकी गुणवत्ता भी प्रभावित हो गई है। किसानों का कहना है कि अगर फसल की गुणवत्ता खराब हो गई, तो बाजार में उसे उचित दाम नहीं मिलेगा, जिससे नुकसान और बढ़ जाएगा।

सिंघिया प्रखंड के उप प्रमुख रिंकू सिंह ने बताया कि यह समस्या सिर्फ एक-दो गांवों तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे इलाके में किसान इसी संकट से जूझ रहे हैं। उन्होंने कहा कि जनप्रतिनिधियों और प्रशासन को इस स्थिति का गंभीरता से संज्ञान लेना चाहिए। उन्होंने सांसद और विधायक से मांग की कि वे क्षेत्र का दौरा करें और किसानों की स्थिति को खुद देखें, ताकि राहत कार्यों में तेजी लाई जा सके। उन्होंने यह भी कहा कि स्थानीय स्तर पर मदद की कोशिश की जा रही है, लेकिन व्यापक राहत के लिए सरकारी सहयोग बेहद जरूरी है।

फसल बर्बादी का असर केवल आर्थिक ही नहीं, बल्कि सामाजिक और मानसिक स्तर पर भी पड़ रहा है। जिन किसानों ने उधार लेकर खेती की थी, उनके सामने अब कर्ज चुकाने की चुनौती खड़ी हो गई है। कई किसान इस चिंता में हैं कि अगर वे कर्ज नहीं चुका पाए, तो भविष्य में उन्हें दोबारा खेती के लिए संसाधन जुटाना मुश्किल हो जाएगा। इस स्थिति ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी असर डाला है, क्योंकि खेती ही यहां की मुख्य आजीविका है।

प्रशासन की ओर से भी इस स्थिति पर नजर रखी जा रही है। स्थानीय अधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि वे प्रभावित क्षेत्रों का सर्वे कर किसानों की सूची तैयार करें, ताकि उन्हें समय पर राहत दी जा सके। अधिकारियों का कहना है कि जैसे ही नुकसान का आकलन पूरा होगा, सरकार की ओर से मिलने वाली सहायता राशि किसानों तक पहुंचाने की प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी। पंचायत स्तर पर भी प्रतिनिधियों को सक्रिय किया गया है, ताकि हर प्रभावित किसान तक मदद पहुंच सके।

बिहार में फसल बर्बादी की स्थिति में सरकार द्वारा मुआवजा देने की व्यवस्था पहले से लागू है। सामान्य फसल नुकसान की स्थिति में प्रति हेक्टेयर 7500 से 10000 रुपये तक की सहायता दी जाती है, जबकि बाढ़, अतिवृष्टि या अन्य प्राकृतिक आपदाओं में यह राशि बढ़कर 8500 से 22500 रुपये प्रति हेक्टेयर तक हो सकती है। यह मुआवजा फसल के प्रकार और जमीन की श्रेणी के आधार पर तय किया जाता है। हालांकि, इसके लिए नुकसान का एक निश्चित प्रतिशत होना जरूरी होता है और प्रशासन द्वारा किए गए सर्वे के आधार पर ही राशि स्वीकृत की जाती है।

सरकार द्वारा चलाई जा रही बिहार राज्य फसल सहायता योजना और कृषि इनपुट अनुदान योजना के तहत किसानों को राहत दी जाती है। इन योजनाओं का उद्देश्य यह है कि प्राकृतिक आपदा के कारण हुए नुकसान की भरपाई कुछ हद तक की जा सके और किसान दोबारा खेती करने के लिए तैयार हो सकें। पिछले कुछ वर्षों में राज्य सरकार ने करोड़ों रुपये की सहायता राशि किसानों के खातों में सीधे ट्रांसफर की है, जिससे लाखों किसानों को राहत मिली है।

आंकड़ों के अनुसार, हाल के वर्षों में लगभग 30 लाख किसानों को करीब 1900 करोड़ रुपये से अधिक की सहायता राशि दी जा चुकी है। इसके बावजूद, जमीनी स्तर पर कई बार किसानों को राहत मिलने में देरी होती है या प्रक्रिया जटिल होने के कारण उन्हें परेशानी का सामना करना पड़ता है। ऐसे में सिंघिया के किसान भी यही उम्मीद कर रहे हैं कि इस बार उन्हें समय पर और पर्याप्त मदद मिलेगी।

फिलहाल किसानों की सबसे बड़ी चिंता यही है कि उनकी बर्बाद फसल का सही आकलन हो और उन्हें जल्द से जल्द मुआवजा मिले। इसके साथ ही वे यह भी चाहते हैं कि भविष्य में ऐसी प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए बेहतर व्यवस्था की जाए, ताकि उनके नुकसान को कम किया जा सके। कई किसान फसल बीमा योजना के प्रभावी क्रियान्वयन की भी मांग कर रहे हैं, ताकि उन्हें आपदा के समय तुरंत आर्थिक सहायता मिल सके।

हालांकि इस कठिन परिस्थिति के बावजूद किसानों का हौसला पूरी तरह टूटा नहीं है। कई किसानों ने कहा कि वे अगले सीजन में फिर से मेहनत करेंगे और नई उम्मीदों के साथ खेती करेंगे। उनके लिए खेती केवल पेशा नहीं, बल्कि जीवन का आधार है। वे जानते हैं कि चुनौतियां आएंगी, लेकिन मेहनत और उम्मीद ही उन्हें आगे बढ़ने की ताकत देती है।

सिंघिया प्रखंड की यह कहानी केवल एक क्षेत्र की नहीं है, बल्कि पूरे बिहार के उन किसानों की हकीकत है जो हर साल प्राकृतिक आपदाओं से जूझते हैं। कभी बाढ़, कभी सूखा और कभी अनियमित बारिश उनकी मेहनत को प्रभावित करती है। ऐसे में सरकार, प्रशासन और समाज की जिम्मेदारी है कि वे किसानों के साथ खड़े रहें और उन्हें हर संभव सहायता प्रदान करें।

आज जरूरत है कि किसानों की समस्याओं को केवल आंकड़ों में न देखा जाए, बल्कि उनके दर्द और संघर्ष को समझा जाए। फसल की बर्बादी केवल आर्थिक नुकसान नहीं, बल्कि एक किसान के सपनों का टूटना है। अगर समय पर सहायता और सही नीति लागू की जाए, तो इन किसानों को फिर से खड़ा किया जा सकता है और बिहार की कृषि व्यवस्था को मजबूत बनाया जा सकता है।

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